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हथौड़ा

ध्याननहीं पड़ता कि अंतिम दफा मैं कब 'सीरियस'हुआ था? क्यों सीरियस हुआ था? किसलिए सीरियस हुआ था? कहां सीरियस हुआ था? सीरियस होना दरअसल एक 'बीमारी'की तरह है। और, मैं यह कभी नहीं चाहूंगा कि मैं सीरियस होकर 'सीरियसली बीमारी'हो-बन जाऊं। मेरा मानना है, सीरियसली बीमार होना कैंसर से...
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  February 22, 2014, 7:21 am
चित्र साभारः गूगलजिनकोअरविंद केजरीवाल के इस्तीफे (या कहूं नौटंकी) पर दुखी या गंभीर होना है, वे शौक से हों। हो सके तो अरविंद केजरीवाल को 'शहीद'का दर्जा भी दे लें। या फिर उन पर कोई वीर रस प्रधान कविता भी लिख दें। फिर भी, इससे न अरविंद केजरीवाल का कद ऊंचा होगा, न उन्हें समझदार...
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  February 20, 2014, 5:29 am
चित्र साभार- गूगलआम आदमी पार्टी (आप) के बहाने निरंतर बदलाव की बात कही जा रही है। हर कोई आप में राजनीति, समाज और व्यवस्था का 'स्वर्ण भविष्य'तलाश रहा है। सब, अपवादों को छोड़कर, यह माने बैठे हैं कि केवल आप ही बदलाव व अलग तरह की राजनीति देश को दे सकती है। अलग तरह की राजनीति का तो ...
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  February 11, 2014, 8:02 am
चित्रः साभार- गूगलफिलहाल, यह दावा तो नहीं करूंगा कि मैंने तसलीमा नसरीन को बहुत पढ़ा है। पर जितना भी पढ़ा है, वो बहुत से कम भी नहीं है। एक लेखक के लेखन की 'वैचारिक प्रतिबद्धता'को समझने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे बहुत पढ़ा जाए, कम पढ़कर भी हम उस लेखक को जान-पहचान सकते हैं। बे...
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  February 8, 2014, 9:33 pm
चित्र साभारः गूगलप्यारे सचिन,देखते ही देखते चौबीस साल हवा हो गए। तुम सोलह की उम्र में बतौर खिलाड़ी खेलने आए थे और चालीस की उम्र में बतौर भगवान विदा हो रहे हो। एक खिलाड़ी को भगवान का दर्जा पाते मैंने कम ही देखा-सुना है। लेकिन हमारे मुल्क में यह इसलिए संभव है क्योंकि व्यक...
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  October 13, 2013, 11:52 am
चित्र साभारः गूगलमुझेनहीं मालूम यह समाज खुद को आधुनिक या प्रगतिशील किसलिए कहता है। जबकि लड़कियों के प्रति आचरण और व्यवहार में यह खुद को अब भी दकियानूसी बनाए हुए है। उनकी स्वतंत्रता व उनकी उन्मुक्ता से भय खाता है। उन पर किस्म-किस्म की बंदिशें इसलिए ताने रहता है, ताकि व...
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  September 16, 2013, 10:11 am
चित्र साभारः गूगलहिंदीदिवस के बहाने या (ना) बहाने जब भी हमने हिंदी पर बात की उसके प्रति हमेशा तरह-तरह की चिंताएं ही जाहिर की हैं। दरअसल, हिंदी के प्रति ये चिंताएं चिंताएं नहीं ‘आत्मप्रलाप‘ हैं, जिसे मंच और पन्नों पर व्यक्त करने की हमें आदत-सी हो गई है। आज भी हम हिंदी को उ...
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  September 13, 2013, 10:31 am
चित्र साभारः गूगलसमाजको समझना टेढ़ी खीर है। समाज कभी किसी मुद्दे पर एक राय नहीं होता। समाज की राय समय-दर-समय, परिस्थिति-दर-परिस्थिति बदलती रहती है। यह जरूरी नहीं कि जो हमारी निगाह में सही हो, समाज की भी हो। सही-गलत का फैसला समाज अपने हिसाब से करता है। लेकिन एक मत फिर भी न...
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  September 11, 2013, 10:13 am
चित्र साभारः गूगलसिर्फसमाज ही नहीं, साहित्य में भी संबंध बड़ा महत्त्व रखते हैं। संबंधों के सहारे मेल-मिलाप व बातचीत को साधा जाता है। बहुत-सी चीजों का आदान-प्रदान होता है। संबंधों को अनाम रिश्तों में ढालकर स्वार्थों को सिद्ध किया जाता है। हालांकि साहित्य में पहले स्व...
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  September 9, 2013, 9:07 am
चित्र साभारः गूगलपहलेउनसे मेरा अच्छा संवाद था। विभिन्न मुद्दों पर अक्सर वाद-संवाद का सिलसिला हम दोनों के बीच चला करता था। वो एक हिंदी दैनिक में स्तंभ लिखा करते थे और मैं उस पर अक्सर अपनी प्रतिक्रिया दिया करता था। चूंकि हमारी विचारधारा आपस में मेल खाती थी, इसलिए उनके ल...
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  September 8, 2013, 5:29 pm
चित्रः- साभार- गूगल'संघर्ष'स्त्री का दूसरा नाम है। समाज में स्त्री हर स्तर पर अपने वजूद की खातिर संघर्षरत है। जितना संघर्ष वो घर-परिवार के बीच रहकर कर रही है, उतना ही बाहर निकल कर भी। साथ ही, स्त्री के संघर्ष से लेखन का क्षेत्र भी जुदा नहीं है। हमारे मध्य ऐसी बहुत-सी लेखिक...
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  September 8, 2013, 8:52 am
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