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असुविधा

मन के आकाश पर घिरतेअवसाद के अंधेरों मेंतुम्हारी स्मृति अक्सरपूनम के चाँद सीदबे पाँव ,बेआवाज़ आती है .....और फिर सचमुच-बेमौसम ,पूनम मावस का अंतर छोड़मेरी रग -रगदिवाली हो जाती है ........!!!!...
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  November 15, 2012, 3:01 pm
टुकड़ों टुकड़ों में मिलती हैं खुशियाँऔर एक टुकड़े को दुसरे से जोड़ने मेंलग जाते हैंपीडाओं के अनगिनत धागे ....नफरतों की तीखी सुई की चुभन सेछलक पड़ती हैं ऑंखेंऔर ज़ज्ब हो जाती है नमीफिर से उन्ही टुकड़ों में ......     आसान नहीं है     एक भीगे टुकड़े को दूसरे  तक पहुँचाना ,    एक ...
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  October 30, 2012, 4:45 pm
जब भी दिए की लौ सी जलती हूँ मैंएक ही दुआ करती हूँ कितुम आओ - चाहे तूफानी हवा बन करया फिर बारिश की बूँदें ,चाहो तो सनसनाता दीर्घ श्वास ही .....बुझा ही दोगे न मुझे ???स्वीकार है मुझे यहरंगीन आत्मघात -क्यूंकिइसी बहाने ही सही ...कोई मुझे फिर जलाएगाऔर तुम्हारामुझ तक ---बार बार आना जान...
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  October 28, 2012, 4:30 pm
मैंने तुम्हें निष्काषित कर दिया हैअपने जीवन के उन तमाम पन्नों सेजहाँ इल्जामों की स्याही से लिख डाले थे तुमनेमेरे अजनबी होने के अहसास ......अब भी वो अजनबियत घुली हुयी हैमेरी रूह, मेरी नसों में-जो कभी कभी उभर आती  हैशब्दों और हरकतों में भी-अच्छा है नफरतों से मुलाकातयूँ अचा...
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  October 24, 2012, 10:03 pm
तमाम ख्वाब तैरा आई आजझील की निस्तब्ध सतह परदेखें रात भर कितनी हलचलमचाती हैं लहरें .....जल जाने दो उन में से कुछ कोसूरज के ताप मेंबाकी बचे हवा की गिरफ्त मेंबिखर ही जायेंगे ....तुम तक तो एक भी न पहुँचने दूँगीचाहे मछलियाँ भी उछल-कूद मचाएं .मेरे ख्वाब हैं ,मेरी तहरीर हैतुमने तो ल...
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  October 18, 2012, 5:08 pm
   अटपटे सवालों के अनमने जवाब और अटका देते हैं रोड़े जीवन की सामानांतर राहों के सीधेपन में ....उतावलेपन की हदों को काटतीतमाम सही-गलत चापेंरिश्तों की मासूम गोलाइयों के अर्थ ही बदल देती हैं ...और इतने कोनों  से चुभोये जाते हैं नुकीले नश्तर कि त्रिभुज के तीन कोणों काअस्ति...
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  September 22, 2012, 4:31 pm
हाँ .आज फिर अकुलाई सी है धरतीपहाड़ों के भेद ,सागर में बहाने को आतुर ....धुंध की चादर से नदी का नीलापन ढकती,तमाम पथरीली राहों का अनगढ़पन बुहारती ,सूने समंदर को लहरों का ब्याज बाँटती,चमकीले तारों को अँधेरे में सजाती,रेत का लहरिया पहनसुबह तक गुनगुनाती ...फिर भी हाँ -आज अकुलाई ...
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  September 18, 2012, 4:10 pm
ज़ख्मों का नासूर बन जाना मेरी उदासी की वज़ह कभी नहीं रहा ना ही मुस्कराहटों ने कभी शहर के मौसम बदले हैं ...उदासी या मुस्कराहटों का बेअसर हो जाना उन्हें औपचारिक नहीं बनाताबल्कि कोई इस तरह सेमेरे वजूद का एक हिस्सा बन जाता है...जोड़ रही हूँ उन हिस्सों को अपनी हथेलियों मेंतु...
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  September 12, 2012, 4:32 pm
सुनी सुनी उन सब कहानियों को सुनोजो बार बार ठहर कर तुम्हारा पता पूछती हैं और अचानक पेड़ की फुनगियों पे टंग जाती हैं परिंदों की उस चहचहाहट को भी सुनो जिसमें सारे जहाँ का संगीत समाया हैमगर शब्दों की रोशनियाँ अब भी गुमसुम हैं.......
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  September 12, 2012, 4:28 pm
हाँ ,अब तुम लौट जाओ...मेरे कोई भी शब्द ,अंक और रेखाएं अब तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेंगे मेरी हथेलियों में तुम्हारे नाम की कोई रेखा बनी ही नहीं ...ना ही मेरे शब्दों को तुम्हारी धडकनों का संगीत ही मिला है...मुझे बंद कमरों की कैद हमेशा से भाती है और तमाम सुबहों शामों से अपन...
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  September 12, 2012, 4:09 pm
भूल जाना कितना अच्छा होता है अगर वह गुनगुनी शाम में तुम्हारे चेहरे पे टपकती परेशानी का एक कोना हो,जिसके बाकी तीन हिस्से आंसुओं के सैलाब में कश्ती की तरह हिचकोले ले रहे हों ..भूल जाना सड़क के पार खुली खिड़की से झांकते परछाई से सूखे फूलों का भी अच्छा होता है जिसे ओस की बू...
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  August 10, 2012, 1:54 pm
चलते-चलते जब तुम्हारीपगडंडियों के पांवों में छाले पड़ जाएँ -तो उन्हें मेरी चौखट पे छोड़ जानामैं उन्हें धो पोंछ कर अपनी ताक में रख दूँगी कम से कमतर हो कर ,खो जाने वालेपलों के बाद यकीनन तुम्हेंदोबारा मेरी तलाश होगी ही....मैं अपनी पलकों को कस कर भींचना भीतब बंद करुँगी जब ह...
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  August 10, 2012, 1:41 pm
रोज़ इतने दर्द झड़ते हैं आसमान से कि समूचा आँचल छटपटा कर साँस तोड़ देता है....कितनी तुरपनें उधड गयी हसरतों कीपर एक टांका भी फुर्सत का लगा नहीं पाए तुम-अब ये कतई ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे हर सवाल के ज़वाब में मुस्कराहटों का समंदर उमड़े या फिर तुम्हारी हर कविता का आगाज़मे...
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  August 4, 2012, 4:26 pm
सारी संवेदनाओं को तिलांजलि दे जब कविता काठ हो जाती है ,तब भी बेहतर होती है वह उन तमाम बेतरतीब खूंटों से जो शब्द उगा पाने में नाकामयाब होकर बस ,यूँ ही उठ खड़े होते हैं जहाँ तहां चाह और आह की जुगाली करने --   यकीन मानो    कविता का मुस्कराना   कभी कभी उतना मायने नहीं रखता    जि...
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  July 8, 2012, 4:12 pm
जीवन के हर मुश्किल पल में जब भी हाथ बढाया तुम फ़ौरन चले आए...पिता,तुम आसमान नहीं हो....!     पाल पोस कर बड़ा किया ,     उखाड़ा ,फिर रोप दिया      किसी और की बगिया में ...     पिता,तुम बरगद तो नहीं हो....!चट्टान की मानिंद सख्त पर उगने देते मखमली काई अपने इर्द गिर्द की नमी में ...पिता,तुम धू...
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  June 17, 2012, 2:15 pm
एक सोच-कि तुम्हारा सब कुछ मेरा है-अब नहीं रही...गुज़र गई वह एक देह की तरह मेरे जीवन की सीमाओं से परे ,वक़्त की शाख से टूटते लम्हों की मानिंद संवेदनाओं के आँचल की फटी गांठ से टपकतीयहाँ -वहां ...अब असंभव है उसे समेट कर फिर से बांध लेना...     एक और सोच-     कि किसी को चाहो तो जिंदगी ...
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  June 16, 2012, 5:21 pm
सुनो,गौर से सुनो उसके क़दमों की आहटचूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन -समझो, उसकी कनखियों के इशारे चुप चुप से संवादों  और माथे की सलवटों के मायने -अब भी लरजते हैं उसके आलता रचे पाँव याद करके तुम्हारी हथेलियों की छुअनज़मीन और उसके तलवों के दरमियाँ -कभी छिपकर देखना उसकी म...
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  June 12, 2012, 4:25 pm
आज फिर से उगी वही तमन्ना एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...मिन्नतें करुँगी सूरज से इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,हवा से करुँगी गुज़ारिश कि सीधे ला पटके मुझे तुम्हारे शहर के आसमान में और बस -मैं बरस पडूँ वहां ......कोई फ़िक्र नहीं जो किसी नदी नाले में भटकती फिर...
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  June 11, 2012, 2:49 pm
स्थिरता ज़रूरी है भावनाओं ,संबंधों और अपेक्षाओं में ...उत्प्रेरक की तरह हलचल मचने आती हैं दुविधाएं संवेदनाओं के भंवर में संदेह के कंकर उछलकूद मचाते हैं -हथेली के नम होने से फिसल  जाती हैआस्थाओं की लाठी और-शिराओं में गहरे तक उतर जाते हैं छिछोरे उलाहने .एड़ी छोट...
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  June 10, 2012, 4:01 pm
तुम बार बार मेरे शब्दों से परे क्यूँ चले जाते हो?हर बार नई कहानी गढ़ तुम्हे मनाया अपनी सारी कवितायेँ तुम्हारे रास्ते बिछा दींतमाम बिम्बों की छाया कर राहत बिखेरी फिर भी-सोच की एक एक कतरन समेट बनाई मेरी संवेदनाओं की पैरहन कितनी बेरहमी से उधेड़ दी तुमने !कभी सोचा कि अब भी मे...
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  May 27, 2012, 5:41 pm
 उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है....सवेरे बहुतेरी चिड़ियों को चुग्गा डालाबगीचे का चक्कर भी लगा आयी तमाम मुरझाये फूलों से मुस्कराहट बांटीसूरज से ओट भी की हथेलियाँ फैला कर मगर एक कोर भी न भीगी मोगरे की बिसूरती कली की- बस,यहीं से उदासी ने हाथ थाम लिया .....      उनींदी द...
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  May 27, 2012, 10:56 am
काश! तुम स्त्री होते और समझते, महसूस करते उस पीड़ा को जो तुम हमें रोजाना देते हो, हर पल -घरों ,चौराहों ,दफ्तरों और एकांत में.तुम देखते अपनी ही आँखों से लुटते हुए अपना सर्वस्व छोटी छोटी बातों पर. तुम देखते मेरे समर्पण को और तौलते अपने अहंकार को मेरे विश्वास और अपने विश्...
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  May 17, 2012, 3:22 pm
कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?यूँ ही जैसे लिखती हूँ सूरज चाँद की रौशनी पर या फिर समंदर की गहराई पर?अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर और नफरत की शिद्दतों पर भी -अब कलम ही नहीं चलतीदूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव ,लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहटजैसे लफ्जों पर!कैसे लिख दूँ ...
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  May 12, 2012, 4:15 pm
जब भी उखाड़ फेंकते हो मुझे तुम अपने जीवन की हरी भरी ज़मीन से आस पास उगे खरपतवार की तरह -मेरी संवेदनाओं की कंटीली झाड़ियाँ तुनक कर और भी तीखी हो जाती हैं...मिटटी का सारा कच्चापन ,सौंधापन तड़कने लगता है ,नुकीले शब्दों की जड़ों के बिंधने से -बादलों के कहकहे भीमुस्कराहटों क...
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  April 22, 2012, 4:21 pm
सूरज के रोज़ सुबह पेड़ पर टंगनेऔर चाँद के दिन भर उबासी लेने के बीच कहीं कुछ नहीं बदला है ...शाम की स्याही भुनभुनाती सी बिखरती है ,तारों को याद दिलाना पड़ता है खिलखिलाना ,और हवा की मुस्कराहट, राह भटक भटक जाती है ...       दर्द की सिहरन भी वैसी ही है        पीड़ा सिर्फ मुख़्तार माई ...
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  April 22, 2012, 4:16 pm
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