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*साहित्य प्रेमी संघ*

 जन्म से मरणासन्न गीली लकड़ियों सी सुलगती सम्पन्नता की इत्री महक में छटपटाती उनकी खुशी देखी हैमैंने मुंबई देखी है,बदबूदार नालों के आगोश में सैकड़ों दो फूटी झोपड़ियां, कीड़ों से बिलबिलाते बचपन, चंद सिक्कों के बोझ से  हिचकोले खाती जवानियाँगर्म गोस्त से सजी दू...
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Tag :shahar
  December 22, 2011, 11:58 pm
महेन्द्र भीष्म जी की उपन्यास "किन्नर कथा" की समीक्षा दयानंद पांडेय जी द्वारा...........किन्नर समाज पर बहुत कम लिखा गया है। और लगभग उपेक्षित ढंग से। लेकिन महेंद्र भीष्म का उपन्यास किन्नर कथा पूरी तरह किन्नर समाज पर केंद्रित है। न सिर्फ़ केंद्रित है बल्कि उन की तकलीफ, उन की उप...
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Tag :साहित्य प्रेमी संघ
  December 22, 2011, 7:24 pm
ह्रदय स्पंदन बंद हो जाये , इस से पहले लौटा दो,श्वाँस-गति धूमिल पड़ जाये ,   इस से पहले लौटा दो.                                                                                  वायु में अस्तित्व विलीन हो जाये.इस से पहले लौटा दो|लौटा दो मुझे मुझको ही,लौटा दो मेरी राहतें.तेरी चाहत तो बस धोखा थीं,लौटा दो मेरी चा...
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Tag :भाव रस
  December 21, 2011, 12:53 pm
 अनिवासी  भारतीय-------------------------पहाड़,जंगल और गावों को लांघते हुए,अपने देश की माटी की खुशबू से महकती नदियाँ,रत्नाकर  की विशालता देख ,उछलती कूदती ,ख़ुशी ख़ुशी,समंदर में मिल तो जाती हैपर उन्हें जब,अपने गाँव और देश की याद आती है,तो उनकी आत्मा,समंदर की लहरों की तरह,बार बार उछल कर,क...
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Tag :
  December 21, 2011, 9:09 am
..."अजीब दस्तूर-ए-ज़िन्दगी..हँसते मज़लिस..बिफरते हम-ज़लीस..!!!"...--प्रियंकाभिलाषी..२०-१२-२०११...
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Tag :कुछ क्षणिकायें
  December 20, 2011, 9:12 pm
देश ये पूराहै धुंध की चपेट में,चारो ही तरफहै इसका ही साया;जीवन अस्त-व्यस्तआमो-खाश भी परेशान,रेल, सड़क, वायु तकहर मार्ग है बाधित;ठण्ड के जोर सेहर चेहरा कुम्भलाया |चादर ये कोहरे कीहै क्षणभंगुर,चाँद दिनों के बाद हीसब यथावत होगा,बसंत राजा के साथ हीये धुंध भी छंटेगा |ये धुंध ...
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Tag :ईं.प्रदीप कुमार साहनी
  December 20, 2011, 1:37 pm
रसोई घर-सबसे बड़ी पाठशाला------------------------------------रसोईघर, सबसे बड़ी पाठशाला है जहाँ,हर कदम आपको ज्ञान मिलता  निराला है आपने ,ठीक से गर खाना बनाना सीख लियातो समझ लो,सारे जहाँ को जीत लियारोटी बनाने की कला,जिंदगी जीने की कला जैसी है  होती क्योंकि आटे की और पानी की, होती है अलग अलग संस्...
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Tag :
  December 19, 2011, 2:11 pm
मैं खोना नहीं चाहता अपनी आवाज,एहसानों के नीचे क्यूँ दबाते हो मुझे?सिद्दत से बेहद चाहा है हमने तुमको,खुद ही कमजोर क्यूँ बनाते हो मुझे?हमें पता है तुमने... .. मेरी आवाज(Complete)My Blogs: Life is Just a LifeMy Clicks-- Neeraj DwivediYou may like: 1.  आठ पापों का घड़ा2. मैंने सच देखा3. मत कहो सच4. एक लघुदीप की लौ...
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Tag :Neeraj Dwivedi
  December 19, 2011, 12:07 pm
सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-1सूफ़ी शब्द का अर्थधार्मिक सहिष्णुता और उदारता आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता रही है। मध्यकालीन भारत में मुसलमानों के आगमन से और खासकर दिल्ली सलतनत की स्थापना के साथ-साथ हिन्दू और इसलाम धर्म के बीच गहन संपर्क हु...
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Tag :'DR. ANWER JAMAL'
  December 19, 2011, 11:58 am
बंधन जाति का खिली कली बीता बचपनजाने कब अनजाने मेंदी दस्तक दरवाज़े परयौवन की प्रथम सीढ़ी परजैसे ही कदम पड़े उसकेआँखों ने छलकाया यौवनहर एक अदा में सम्मोहनवह दिल में जगह बना बैठीसजनी बन सपने में आ बैठी |धीरे-धीरे कब प्यार हुआसाथ जीने मरने काजाने कब इकरार हुआछिप-छिप कर आना ...
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Tag :
  December 19, 2011, 11:25 am
शिकवा-शिकायत      Rate Thisशिकवा-शिकायत——————-देख कर अपने पति की बेरुखी,करी पत्नी ने शिकायत इस तरहहम से अच्छे तुम्हारे ‘डॉग’ है,घुमाते हो संग जिनको हर सुबहगाजरों का अगर हलवा चाहिये,गाजरों को पहले किस करना पड़े,इन तुम्हारे गोभियों के फूल से,भला गुलदस्ता सजेगा किस तरहसर्दियो...
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  December 17, 2011, 1:40 pm
लगे उठने अब करोड़ों हाथ है----------------------------------करोड़ों  के पास खाने को नहीं,                 और नेता करोड़ों में खेलतेझूंठे झूंठे वादों की बरसात कर,                 करोड़ों की भावना से खेलतेकरोड़ों की लूट,घोटाले कई,                  करोड़ों स्विस बेंक में इनके जमापेट फिर भी इनका भरता ही ...
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  December 15, 2011, 9:42 am
        बदनसीबी        --------------मुफलिसी की मार कुछ ऐसी पड़ी,               भूख से बदहाल था सारा बदन सोचा जाए,धूप खायें,बैठ कर,               कुछ तो खाया,सोच कर बहलेगा मनबेमुरव्वत सूर्य भी उस रोज तो,               देख कर आँखें चुराने लग गयाछुप गया वो बादलों की ओट में,                बेरुखी ऐसी  दिखान...
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  December 14, 2011, 9:48 am
इंसानियतकीअबकिसेदरकारहैयहाँ !दुश्मनभीदोस्तकीतरहमिलतेहैंअबयहाँ !!कहतेहैंजोखुदकोहरिश्चंद्रवोजनाब !देखाहैहमनेझूठबोलतेउन्हेंयहाँ !!कहतेहैंलोगज़िन्दगीमेंहैंमुसीबतें !लायेमुसीबतेंहैंजोढोकरकरकेखुदयहाँ !!देतेउलाहनाहैंजोहरबातपरहमें !देखाहैहमनेरंगबदलतेउन...
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Tag :
  December 14, 2011, 12:00 am
याद आती है हमें वो सर्दियाँ....--------------------------------गर्म गुड के गुलगुलों के दिन गयेबाजरे के  खीचडों  के  दिन गयेअब तो पिज़ा और नूडल चाहिये,हाथ वाले  सिवैयों के   दिन गयेसर्दियों में आजकल हीटर जलें,संग तपते अलावों के दिन गयेतीज और त्योंहार पर होटल चले,पूरी  ,पुआ ,पुलाओं के  दिन गयेब...
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  December 13, 2011, 8:57 am
तारीख़ गवाह है कि भले ही मीडियाकर्मियों पर सैटिंग अथवा वसूली के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं लेकिन समाज के इस कथित चौथे स्तंभ की सक्रियता से इस देश में हो रहा अरबों का भ्रष्ट्राचार थोड़ा ही सही पर कंट्रोल में है । यक़ीनन ये मीडिया ही है जिसकी वजह से राष्ट्र्मंडल खेलों...
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Tag :पत्रकारिता/मीडिया
  December 12, 2011, 11:29 am
एक थैली के चट्टे बट्टे ---------------------------बी जे पी हो या कांग्रेसये सब के सब है एक जैससब दल जनता को भरमाते,है बदल बदल कर अलग भेषमन बहलाते इनके वादे,भाषण लम्बे लम्बेपर हमने देखा ये सब है,एक बेल के तुम्बेसत्ता मिलते ही ये देखा,सब करते है ऐशबी जे पी हो या कांग्रेसये कर देंगे,वो कर दें...
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Tag :
  December 12, 2011, 10:17 am
१९ अन्य कवियों के साथ मेरा पहला काव्य संग्रह:"टूटते सितारों की उड़ान"अभी तो है ये पहली उड़ान,बाकि अभी नापना सारा आसमान है;दो पग ही पथ में बढ़ा हूँ अभी,आगे तो अभी पुरा जहाँ है |हृदय में है ख्वाहिश, मन है सुदृढ़,हाथों की लकीरों में भी कुछ निशान है :अभी तो है ये पहली उड़ान,बाकि ...
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Tag :टूटते सितारों की उड़ान
  December 11, 2011, 7:34 pm
खिड़की पर खड़ी मैं नीचे जीवन देख रही थी|भारी बस्तों के बोझ तले कुचले बचपन देख रही थी|सूनी आँखों में मरे हुए मैं स्वप्न देख रही थी|माँ-बाप के ख्वाहिशों धोते मैं रुदन देख रही थी|रक्त-रंजीत कदम की राह में पड़े नुकीले कुरून देख रही थी|हाँ मैं जीवन देख रही थी,मैं बचपन देख रही थी...
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Tag :भाव रस
  December 11, 2011, 12:57 pm
ग़मों की धुंध जो छाई हुई है छंट जाये.कुछ ऐसे ख्वाब दिखाओ कि रात कट जाये.नज़र के सामने जो कुछ भी है सिमट जाये.गर आसमान न टूटे, ज़मीं ही फट जाये.मेरे वजूद का बखिया जरा संभल के उधेड़हवा का क्या है भरोसा, कहीं पलट जाये.मैं तय करूंगा हरेक लम्हा इक सदी का सफ़रकि मेरी राह का पत्थर ज...
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  December 11, 2011, 1:08 am
जैसे जैसे दिन ढलता है---------------------------------जैसे जैसे दिन ढलता है ,परछाई लम्बी होती हैजब दीपक बुझने को होता,बढ़ जाती उसकी ज्योति हैसूरज जब उगता या ढलता,                            उसमे होती है शीतलता इसीलिए वो खुद से ज्यादा,                             साये को है लम्बा करता और जब सूरज सर पर चढ़ता,...
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  December 10, 2011, 1:40 pm
स्वयंको कर विदीर्णदिन-प्रतिदिनरात दर रातसिद्धांतो के पोषण मेंकर दिया देह को भीसमर्पित एक दिनशाश्वत अग्नि को-कि रहे अनश्वरअनादि सनातन सत्य ---लोगबड़े विचित्र अनुसरण के विपरीत महानता का चोला ओढ़ा दिया  जीते जी पाया सिर्फचंद हार,अपवित्र हाथों सेऔर मरने पर पायाअसहाय ...
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Tag :भाव रस
  December 9, 2011, 3:13 pm
बेगुनाह भी मैं,गुनाहगार भी मैं|विध्वंसकारी,रचनाकार भी मैं|सारी सृष्टि तन्मय मुझमे,इस सृष्टि से बेज़ार भी मैं|हर रूप में मैं,सब रूप मेरा|साकार हूँ तो निराकार भी मैं|ब्रह्मनाद ओमकार भी मैं,नास्तिकों का तिरस्कार भी मैं|रक्त-पिपासु तलवार भी मैं,प्यास बुझती धार भी मैं|आती ...
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Tag :भाव रस
  December 8, 2011, 3:15 pm
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