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Blog: Sudhinama

Blogger: Sadhana Vaid
घर से बाहर कहीं जाना हो तो प्राय: सुबह नौ दस बजे के बाद ही निकलना होता है ! सड़कें इस समय भीड़ से अटी पड़ी होती हैं और लोगों के चेहरों पर जल्दबाजी, तनाव और झुँझलाहट के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं ! सबको अपने गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी होती है ऐसे में किसीका वाहन ज़रा सा किसी... Read more
clicks 122 View   Vote 0 Like   8:29am 22 May 2012 #
Blogger: Sadhana Vaid
हाथों की लकीरों में ज़िंदगी उसी तरह उलझ गयी है जैसे बहुरंगी स्वेटर बुनते वक्त सारी ऊनें उलझ जाती हैं औरजब तक उन्हें पूरी तरह से सुलझा न लिया जाये एक फंदा भी आगे बुनना असंभव हो जाता है ! भागती दौड़ती सुबह शामों के बीच किसी तरह समय निकाल स्वेटर की उलझी ऊन को तो मैं फिर भी सुलझ... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   5:39pm 17 May 2012 #
Blogger: Sadhana Vaid
सदियों से प्रतीक्षा में रतद्वार पर टिकी हुई उसकी नज़रें जम सी गयी हैं ! नहीं जानती उन्हें किसका इंतज़ार है और क्यों है बस एक बेचैनी है जो बर्दाश्त के बाहर है ! एक अकथनीय पीड़ा है जो किसीके साथ बाँटी नहीं जा सकती !रोम रोम में बसी एक बाँझ विवशता है जिसका ना कोई निदान है ना ही कोई ... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   6:12pm 4 Mar 2012 #इंतज़ार
Blogger: Sadhana Vaid
नन्हा लंगूर डिम्पी अपने कान में उंगली डाले ज़ोर ज़ोर से चीख रहा था ! जिस पेड़ पर उसका घर था उसके नीचे बहुत सारे बच्चे होली के रंगों से रंगे पुते ढोल बजा बजा कर हुड़दंग मचा रहे थे ! कुछ बच्चों के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कुछ के हाथ में धारदार बाँख ! ये सब होली जलाने के लिये लकड़ी जमा ... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   5:49pm 25 Feb 2012 #
Blogger: Sadhana Vaid
विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिये या अभूतपूर्व मुकाम हासिल करने के लिये सम्मानित किया जाना किसे अच्छा नहीं लगता ! बहुत प्रसन्नता होती है जब आपके कार्यों को और आपकी उपलब्धियों को सराहा जाता है और मान्यता मिलती है ! लेकिन इस प्रक्रिया के लिये भी क्या छोटी बड़ी... Read more
clicks 127 View   Vote 0 Like   7:32pm 22 Dec 2011 #राष्ट्रीय पुरस्कार
Blogger: Sadhana Vaid
रफ्ता-रफ्ता सारे सपने पलकों पर ही सो गये ,कुछ टूटे कुछ आँसू बन कर ग़म का दरिया हो गये !कुछ शब की चूनर के तारे बन नज़रों से दूर हुए ,कुछ घुल कर आहों में पुर नम बादल काले हो गये !कुछ बन कर आँसू कुदरत के शबनम हो कर ढुलक गये ,कुछ रौंदे जाकर पैरों से रेज़ा रेज़ा हो गये !कुछ दरिया से मोती ... Read more
clicks 149 View   Vote 0 Like   9:51am 14 Dec 2011 #गज़ल
Blogger: Sadhana Vaid
जाने क्यों आज सारे शब्द चुप हैं ,सपने मूर्छित हैं ,भावनायें विह्वल हैं ,कल्पनाएँ आहत हैं ,गज़लें ग़मगीन हैं ,इच्छाएं घायल हैं ,अधर खामोश हैं ,गीतों के सातों स्वर सो गये हैं और छंद बंद लय ताल सब टूट कर बिखर गये हैं !मेरे अंतर केचिर परिचित निजी कक्ष के नितांत निर्जन, सूने, नीरव, ... Read more
clicks 146 View   Vote 0 Like   6:02pm 6 Dec 2011 #
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