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हिंदी हैं हम..

कुछ प्याले टूटे फूटे से,लुढ़के और बिखरे बिखरे से… ठोकर खाते है यहाँ वहां,मधुशाला के इन कोनों में.... मदिरा पिने वालों को,इन प्यालों से कोई बैर नहीं,पर ये भी सच है की इनमे,नहीं अपना कोई  हैं गैर सभी। उन टूटे प्यालों के टुकड़ों में,कोई अक्स नहीं,कोई शख्स नहीं ,कुछ टूटे स...
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  October 16, 2014, 12:34 pm
कुछ ऐसा ढूंढ़ रही हूँ मैं,जो चिर काल तक संग रहे,वो जो बदले कोई रंग नविन,तो  जीवन सतरंगी कर दे…एक हँसी कि जिसकी सरगम में,जलतरंग का सुकून सा हो,एक अग्नि जिसके ताप में भी,ऊष्मा हो लेकिन जलन न हो.…वो स्वप्न मेरा मिल जाए तो,ये मन भी एक कोना ढूंढ़े,वरना इस दुर्गम राह में,ये राही घाट...
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  October 9, 2014, 9:38 pm
इस दुनिया में कृतज्ञता बड़ी क्षणभंगुर है.... और अहम् शायद सर्वकालिक. इंसान इस गलतफहमी में रहता है,मैं बहुत अच्छा  हूँ, मेरी अच्छाई सर्वोपरि है... हम अच्छा करेंगे और अच्छा पायेंगे. कभी ये अहसास होता ही नहीं हैं कि अगले क्षण हमारे साथ कुछ बुरा भी घट सकता है. हमेशा अपनी सुरक्...
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  October 22, 2013, 10:31 am
एक छोटा टुकड़ा घर का सामान के साथ नहीं ला पाई, छोड़ आई मैं मन का एक हिस्सा भी वहीँ बिस्तर पे ... या बालकोनी में रखी मेरी वाली कुर्सी पर उस खिड़की पर भी देखना जहाँ लड़के तुमसे मैं खड़ीं थी... तुम दफ्तर की जद्दोजेहद में थे,खाना बनाने में मैं जुटी थी... फाइलों में घिरे थे तुम ,मैं र...
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  August 14, 2013, 7:35 pm
चुप चाप अकेले कोने में,है भला मज़ा क्या रोने में,संग साथ मिलो ,साथ चलो,कि मज़ा भी आये ढ़ोने में....ढोयें कुछ कड़वी तीखी यादें,कुछ विफलताएँ,कुछ बिखरे सपने,कुछ धोखे उनसे जो अपने थे,और तिरस्कार उन गैरों के,एक टुटा सामान जिसे दिल कहते थे, बुराइयाँ जिन्हें आदत की लिहाफ चढ़ाई थी ...
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  June 28, 2013, 10:50 am
उन कागज के सिकुड़े टुकड़ों जैसे,पलों को अब दिल से हटायें...चलो कुछ नया बनाएं...अच्छाई बुराई की कशमकश से निकलें,दिल को मनचाही बातों का चस्का लगायें...लोगों में न ढूंढे अपनी खुशियाँ,सपनों के किले फिर से सजाएं...चलों कुछ नया बनाएं...हसें अपने ऊपर जब फुरसत मिले तो,दूसरों के जज्बो...
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  June 26, 2013, 2:23 pm
                           एक चिड़िया,अपने घोंसले को छोड़ उडी... सुहानी हवाएँ थी, धुप की हल्की सी गर्मी और चमकती सुनहरी किरणें उसमें एक नया उत्साह भर रही थीं!! उसका घोसला,रात के तूफ़ान से जर्जर हो चूका था... ये पहला घोंसला था,इसीलिए उसके टूटने से चिड़िया कल तक बहुत उदास थी. लेकिन इस चमकत...
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  June 19, 2013, 3:42 pm
प्यार  को बहुचर्चित देखा,सत्य और नैसर्गिक देखा...चन्दन से लिपटे अजगर को,इसी प्यार से व्यथित देखा...प्यार को प्यालों में,लुढके और लिपटे देखा,गालों पे सूखी लकीरों में,आंसू के संग मिश्रित देखा....आगे बढ़ते क़दमों को,बेड़ियों से जकड़ते देखा....फैले हुए परों की,उड़ानों को समेटत...
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  June 17, 2013, 11:05 pm
अश्कों में छुपाया जिसको,हंसी से दिखाया जिसको,कहते थे नहीं है करना,वो इश्क किया है तुझको....छुपाया यूँ नहीं पर,दिखाना आता नहीं था,सच है हमें सच को,जतलाना आता नहीं था..अनकहे को समझने में,एक होड़ सी लगी थी,शब्दों को कहने में,वो मज़ा ही नहीं था...दिन बिता ,गुजरे सालों,हमने कहना ही ...
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  June 13, 2013, 11:52 pm
जब मिला हमारा कोना वो..तब दिल ने कहा हम घर आये...आँखों को कहा तुम मत रोना,दिल को हम कैसे समझाए...अपने बिखरे चिथड़ों में भी,ढूंढे यादों के जो साए...क्या ये वो ही सीढियां हैं माँ,जिसपर मैं दौड़ा करता था,तू हाथ पकडती थी मेरा,और मैं ठुनका करता था...इस बरगद के पेड़ तले,स्कूल के बस्ते क...
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  June 13, 2013, 7:29 am
बदल देते वो सारी गलतियाँ,अगर हम काल चक्र घुमा पाते...हम दे देते एक नयी परिभाषा,खुद को कटु अनुभवों से बचा पाते...खड़े हो कर,हर नयी बात को,पुरानी बातों से न जुड़ा पाते,नीव खस्ता जुड़ गयी तो,उनपर ऊँची ईमारत कहाँ बना पाते...दुःख को,परेशानी को,शब्दों से हमेशा छुपाया है हमने,पर हाल...
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  March 3, 2013, 8:39 am
वो भी कभी दिन थे जब लिखने को काफी कुछ न था...पर समय इतना की हर दिन कुछ न कुछ मैं लिख ही लेती थी,और अब जब हर दिन या यूँ कहूँ किसी भी क्षण कुछ नया हो जाता है,समय ही नहीं की इन दिनों की स्मृतियों को शब्दों में बाँध लूं.ये नहीं कहूँगी की इस छोटी सी परी के आने से हर दिन होली और रात दिवा...
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  September 28, 2012, 8:46 am
लोगों की इस भीड़ में,तुम ही क्यों वो अपने हो,जीवन भर जो साथ निभाए,तुम मेरे वो सपने हों...प्यार के हाथ कईयों ने बढ़ाये,तुमने थामा हाथ मेरा,शब्द के बाण कईयों ने छोड़े,तुमने आँचल थाम लिया,यूँ तो मेरी गलतियाँ भी,तुम स्वयं मुझे बतलाते हो,पर जब भी छुटी आशा तो,किरण नई दिखलाते हो,"मन...
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  February 29, 2012, 10:58 pm
जिनके लिखने को रोशनाई भी कम पड़ जाती थी,अब हमारी वो कलमें छुपाई जाती हैं,वो साडियां जिनमें लगती थी कल्फें,अब सलवटों से सजी नज़र आतीं हैं...घर के जिन कोनों में पसरता था सन्नाटा,अब आवाजों से गूंजा करता है,पसरती थी जहाँ हर जगह नफासत,अब खिलौनों का ढेर नज़र आता है..कभी मैं उसके ...
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  January 25, 2012, 12:04 pm
जिनके लिखने को रोशनाई भी कम पड़ जाती थी,अब हमारी वो कलमें छुपाई जाती हैं,वो साडियां जिनमें लगती थी कल्फें,अब सलवटों से सजी नज़र आतीं हैं...घर के जिन कोनों में पसरता था सन्नाटा,अब आवाजों से गूंजा करता है,पसरती थी जहाँ हर जगह नफासत,अब खिलौनों का ढेर नज़र आता है..कभी मैं उसके ...
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  January 25, 2012, 12:04 pm
कब तक वो पुरानी पीढ़ी,आजादी की रह पाएगी...देखो गाँधी के रंग में रंगी,अन्ना की गाड़ी आएगी...जब देश के रक्षक ही,यूँ भक्षक बन जायेंगे,एक किसान पर धोके से,जवान गोली चलाएंगे..अपनी बात को कहना,जब जुर्म हो जायेगा,गाँधी के देश में ,सत्याग्रह गुनाह कहलायेगा...एक दूजे पे आरोपों के ,जब प...
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  August 16, 2011, 3:35 pm
गए कुछ दिनों से..कुछ नया नहीं लिखा!जीवन ने इस कदर उलझाया था समय ही नहीं मिल रहा था... पर कई बार मन किया लिखूं..अब जब चारो तरफ से लोग इतना बोल रहे हो तो हम जैसे लिखने वालों के पास विषय की कमी तो हो नहीं सकती... विषय वही अपने देश के घोटालों का और मुद्दा वही भ्रष्टाचार हटाने का|मनु क...
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  July 9, 2011, 12:49 pm
"वो बहुत सीधा है सुरभि,और कुछ नहीं|झगड़े तो प्यार का ही हिस्सा होते हैं...तुझे नहीं लगता कि तुने शादी को कुछ ज्यादा ही आदर्शवादी परिभाषा दे रखी है|अपनी विचारों की संकीर्णता से बाहर निकल...""देख मिताली! क्या अपने पति से समझदारी की अपेक्षा रखना गलत है|वो किसी भी चीज़ को गंभीरत...
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  December 30, 2010, 7:50 am
"स्वर, तुम कमरे में ही हो ना!!" कोई उत्तर नहीं आया...कमरे में फैली इस निस्तबधता ने मुझे और अधीर कर दिया.. मैंने अधीर होकर फिर पुकारा"स्वर!स्वर!"अचानक कन्धों पर एक जाने पहचाने स्पर्श को पा कर मैं पलटी |"क्या हुआ मीतू,ऐसी बेचैन सी क्यों हो,मैं बालकनी में था,सोचा तुझे डराऊं पर तुम त...
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  December 29, 2010, 6:50 pm
पहले तो अपने ब्लॉग के नियमित पाठकों से इस अनकहे विश्राम के लिए खेद प्रकट करती हूँ| सच कहूँ तो इस अंतराल में मेरी रचनात्मकता को एक अल्पविराम की आवश्यकता थी, इस अंतराल में कई पुस्तकें पढ़ीं और कहना ही होगा कि उनका भरपूर आनंद उठाया और छोटी बड़ी कई बारीकियों को जान एक बार फि...
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  December 29, 2010, 12:54 pm
कुछ उदास सा है वो,परेशान है शायद,लगता बहुत कठोर है,पर कमजोर है शायद!!अक्सर लोगों की जुबान पर,मिर्ची सी रहती है,वो शहद की मिठास से,अनजान है शायद!आँखों में हँसी का कोई,नामों निसान नहीं,आँसू का कतरा भी ये देख,हैरान है शायद!घर के आसरे से निकल,इस सड़क की धुल में,लिपटा हुआ उसका वजू...
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  November 27, 2010, 9:49 pm
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  November 18, 2010, 10:17 am
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  November 18, 2010, 10:15 am
जीवन के बढ़ती परिधि में,छोटी सी मेरी इस निधि में,नई राह में चलते हुए लगा,क्या क्या मैं अपने संग रख लूँ?कभी बढ़ती घटती धड़कन में,कभी कतार के कोलाहल में,इस संसार के हलाहल में,प्रेम सुधा से आत्मा तृप्त कर लूँ...कभी चक्षु जो ना निर् बहाते थे,ह्रदय क्रंदन कर जाता था,पुरानी कटूक्...
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  October 29, 2010, 6:12 pm
टीवी अर्थात मुर्ख डब्बा!!!आजकल धारावाहिकों की भरमार है...हम चाहे इन धारावाहिकों की कितनी भर्त्सना कर लें पर एक आम घरेलू औरत के समय काटने का ये साधन ना केवल सर्वाधिक उपयोगी है वरन एकमात्र सहारा भी! मेरी पड़ोसन ने मुझे एक बार कहा,"पढ़ने की आदत रही नहीं, घर का काम तो अब रोजाना ...
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  October 29, 2010, 10:12 am
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