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युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की नई आलोचना-पुस्तक है - 'पाठक का रोजनामचा' जो डायरी विधा में लिखी गई है । उन्हीं के किताब से उसका अध्याय सप्तम है जो सुशील कुमार की कविताई पर केन्द्रित है । यह जितनी समीक्षा है उतनी ही आलोचना। जितनी आलोचना है उतनी ही डायरी , यानि इन विधाओं के ...
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Tag :आलेख
  July 23, 2017, 6:00 pm
[यह समालोचना कवि-कथाकार तेजिन्दर जी केंद्रित अंक पत्रिका *छत्तीसगढ़-मित्र* अप्रैल 2017 में छपी है। ] - सुशील कुमार"यह कविता नही...
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Tag :तेजिन्दर
  July 17, 2017, 5:33 pm
युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की नई आलोचना-पुस्तक है - 'पाठक का रोजनामचा' । उन्हीं के किताब से उनका पूर्वकथन - अभिप्राय साहित्य को समय के सन्दर्म में देखना समझना केवल साहित्य के लिए नहीं समय को परखने के लिए बेहद जरूरी है । समय और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं । समय और सा...
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Tag :umashankar sungh parmaar
  July 7, 2017, 8:07 pm
संध्या नवोदिता हिन्दी की ऐसी युवा कवयित्री हैं जिन्होंने आधुनिक कविता में बिना शोर किए अवधूती कविताओं का एक शिल्प रचने का प्रयास किया है जिसका केंद्रीय स्वर प्रेम है । आइए उनकी ‘सुनो जोगी’ सीरीज की कुछ बेहतरीन कविताओं से आपको रु-ब-रु कराते हैं -सुनो जोगी !Bottom of Form1.सारी च...
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Tag :संध्या नवोदिता
  July 2, 2017, 4:37 pm
【मेरा यह लेख 'लहक' पत्रिका के अप्रैल-मई 2017 अंक में छपी है जो सुधी पाठकों को समर्पित है -सुशील कुमार】           ●जरूरी नहीं कि...
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Tag :सुशील कुमार
  June 16, 2017, 1:32 pm
(लहक का मुक्तिबोध पर मई जून 2017 विशेष अंक का संपादकीय आलेख , जिस पर कई कवि-लेखक-आलोचक  को गहरी आपत्ति है।)मत सोखो हिंदी का पानी क्या पलटकर भिड़ने का यह मौका नहीं ? मुक्तिबोध और मुहाने का आदमी  लेखक-दार्शनिक सार्त्र ने कहा है-‘द अदर इज हेल' अर्थात दूसरा नरक है। जब हम दूसरे...
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Tag :मुक्तिबोध
  May 30, 2017, 9:04 am
राजकिशोर राजन की कविताएँ समकालीन कविता : परिवेश और मूल्य               - सुशील कुमार                 [ यह समालोचना पटना से प्रकाशित पत्रिका 'नई धारा  ' (संपादक-शिवनारायण ) के हालिया अंक  दिसंबर-जनवरी 2017 में प्रकाशित हुई है, जिसे साभार यह...
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Tag :राजकिशोर राजन
  April 9, 2017, 10:29 am
[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। यहाँ साभार प्रकाशित ]  असल में दुनिया को बेहतर बनाने के ठेके ने धरती को नरक में तब्दील कर दिया। यह ठेकेदारी किसी ने दी और तब किसी ने ली की तरह नहीं है। यह क...
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Tag :उमाशंकर सिंह परमार
  March 20, 2017, 12:31 pm
[ यह बहुचिंतित समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लमही ' (संपादक-विजय राय ) के हालिया अंक  जनवरी -मार्च , 2017 में प्रकाशित हुई है, जिसे साभार यहाँ छापी जा रही है। । ] - ---------------------------------------------------------------------------              नव स्त्रीवाद – जमीन से पृथक अंतर्विरोध -उमाशंकर ...
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Tag :सुशील कुमार
  February 11, 2017, 3:08 pm
[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। ] -डॉ. अजीत प्रियदर्शी  अखिलेशकीकहानियोंमेंछिनरपन- नयी कहानी में भोगवाद - संभोगवादआजादी के सपनों से मोहभंग, विभाजन की त्रासदी और पारिवारिक टूटन के ब...
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Tag :sushil kumar
  January 22, 2017, 12:03 pm
[ यह प्रतिवाद  कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुआ  है। ] -सुशील कुमार ‘तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह’(गतांक अक्तूबर-नवंबर ’16में प्रकाशित प्रत्यालोचना के प्रतिक्रियास्वरूप) शम्भु बादल की कविताओं ...
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Tag :poems of Sushil Kumar
  January 20, 2017, 8:31 am
संयुक्त अरब इमारात से निकलने वाली हिंदी की साहित्यिक पत्रिका (संपादक -कृष्ण बिहारी , कार्यकारी संपादक - प्रज्ञा संपादक) ...
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Tag :
  January 10, 2017, 1:44 pm
[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। ] - वर्धमानमहावीरऔरसिद्धार्थगौतमऐसेदोअविचलशिखरहैं ,जिन्होंनेमहावीरत्वऔरबुद्धत्वकीउपलब्धिकेबादपृथ्वीपरवैदिककर्मकांड, अस्पृश्यताऔरजातिववादक...
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Tag :भरत प्रसाद
  January 7, 2017, 8:52 pm
शुक्रगुजार हूँ दिल्ली   (एक)बेमेल शब्दों के बीच जैसे शब्द खो देते हैं अर्थ अपनी प्रासंगिकता ढेर सारे शब्दों के बीच भी महसूस करते हैं अटपटा बिलकुल तन्हामैं महसूस करता हूँ दिल्ली में जैसे माँ समझ लेती है बच्चों की तोतली भाषा के अस्फुट आधे-अधूरे शब्दों के अर्थ मेरा ...
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Tag :संतोष श्रेयांस
  December 18, 2016, 2:38 pm
पहली बार : शिरोमणि महतो की कविताएँ...
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Tag :
  December 16, 2016, 9:02 pm
        [कविद्वय विजेंद्र और एकांत पर केन्द्रित यह समालोचना पत्रिका 'लहक' (संपादक - निर्भय देवयांश )के अंक अक्तूबर-नवंबर, 2016 में प्रकाशित हुई है । ] अन्तर्विरोधों से ग्रस्त अवसरवाद का अन्यतम नमूना   विजेंद्र के इस विचलन से लोक के पक्ष में चल रहे अभियान को ...
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Tag :एकांत श्रीवास्तव
  November 27, 2016, 3:50 pm
आनन्द गुप्ताकी कविताओं से गुजरते हुए प्रतीत हुआ कि यह युवा केवल कवि नही हैं, अपने शब्दों की पूरी ताकत निचोड़कर सत्ता के तमाम छद्मों द्वारा सृजित अन्धकार के खिलाफ मुठभेड करता हुआ हिन्दुस्तानी आवाम हैं। मामला केवल कविता का नहीं है । यह आजादी के बाद लोकतन्त्र में काबिज प...
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Tag :आलोचना
  November 25, 2016, 5:28 pm
[पत्रिका - लहक (संपादक: निर्भय देवयांश) के जुलाई-सितंबर अंक में प्रकाशित] - उमाशंकर सिंह परमार रीतिकालके कवि ठाकुर बुन्देलखंडी का कहना था कि  “ढेल सो बनाय आय मेलत सभा के बीच लोगन कवित्त कीनों खेलि करि जान्यों है” ठाकुर का यह कथन कविता की रचना प्रक्रिया को लेकर था । आज भ...
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Tag :आलोचना
  October 13, 2016, 9:05 am
अपने लेख के बारे में डा. अजित प्रियदर्शी अपने टाइमलाइन पर  फेसबुक में लिखते हैं - "लहक पत्रिका के जुलाई -सितम्बर 2016 अंक मेंउदय प्रकाश और उनके नक्शेकदम पर चलने वाले समकालीन कहानीकारों की कहानियों में सेक्स की छौंकऔर रूढ़िबद्ध फार्मूलेपन पर काफी बेबाकी से लिखा ...
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Tag :
  September 29, 2016, 7:57 pm
[ यह समालोचना  नई दिल्ली  से प्रकाशित पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी ' (संपादक-रमणिका गुप्ता ) के अंक सितंबर, 2016 में प्रकाशित हुई है। ](कवि शम्भु बादल के कृतित्व पर केन्द्रित) --------------------------------------------------यहकेवल संयोग नहीं किसमकालीनहिन्दी कविता मेंएकसाथ कई पीढ़ियाँ काम कर रही हैं,जिन...
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Tag :
  September 27, 2016, 7:59 pm
असंख्य चेहरों में आँखें टटोलतीं है एक अप्रतिम चित्ताकर्षक चेहरा- जो प्रसन्न-वदन हो - जो ओस की नमी और गुलाब की ताजगी से भरी हो - जो ओज, विश्वास और आत्मीयता से परिपूर्ण- जो बचपन सा  निष्पाप  - जो योगी सा कान्तिमय और - जो धरती-सी करुणामयी  हो कहाँ मिलेगा पूरे ब्र...
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Tag :कविता
  December 28, 2014, 12:13 pm
बाज़ार जब आदमी का आदमीनामा तय कर रहा हो जब धरती को स्वप्न की तरह देखने वाली आँखें एक सही और सार्थक जनतंत्र की प्रतीक्षा में पथरा गई हों सभ्यता और उन्नति की आड़ में जब मानुष को मारने की कला ही जीवित रही  होऔर विकसित हुई हो  धरती पर जब कविता  भी एक गँवार ग...
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Tag :यह चुप्पियों का शहर है
  December 28, 2014, 12:06 pm
1.तथाकथित अति सभ्य और संवेदनशील समाज मेंसब ओऱ दीवारें चुन दी गई हैंऔर हर दीवार के अपने दायरे  बनाए गए हैं इन दायरों -दरो -दीवारों  को फाँद कर हवा तक को  बहने की इजाज़त नहीं 2.खिड़कियाँ खोलने पर यहाँ कड़ी बन्दिशें हैंक्योंकि अनगिनत बोली, भाषा और सुविधाओं के रंग में...
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Tag :तुम्हारे शब्दों से अलग
  December 28, 2014, 7:34 am
पचास की वय पार कर मैं समझ पाया कि वक्त की राख़ मेरे चेहरे पर गिरते हुए कब मेरी आत्मा को छु गई, अहसास नहीं हुआ उस राख़ को समेट रहा हूँ अब दोनों हाथों से 2.दो वाक्य के बीच जो  विराम-चिन्ह है उसमें उसका अर्थ खोजने का यत्न कर रहा हूँ 3.मेरे पास खोने  को  कुछ नहीं बचा ...
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Tag :शब्द सक्रिय रहेंगे
  December 28, 2014, 7:27 am
कविता शब्दों से नहीं रची जातीआभ्यांतर के उत्ताल तरंगों को उतारता है कवि कागज के कैनवस पर एक शब्द-विराम के साथ /कविता प्रतिलिपि होती है उसके समय का जो साक्षी बनती है शब्दों के साथ उसके संघर्ष का जिसमें लीन होकर कवि जीता है अपना सारा जीवनबिन कुछ कहे,और जीने को ...
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Tag :कविता
  October 29, 2014, 11:32 am
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