मन के - मनके

१.सांझ की लहरों पर--- उम्मीदों की कंदीलें हैंजीवन की सुबह ढलकतीकुछ,साथ उजाला चलता है,                कंदीलों की परिछांई में—२. वैसे तो, किताबे-ए-ज़िंदगी  खुली किताब है मेरी---  हर्ज़ नहीं, पलटले वर्क इसके कोई,कभी-कभी  फ़कत,एक पन्ना,मोड कर रखा है,मैंने                       सिर्फ़ मेरे लि...
मन के - मनके...
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  May 21, 2012, 9:52 am
बहुत सीधे-सादे रूप में जीवन का सार—बस ’इस पल का मोती मेरा है—ना भूत ना भविष्य,यही पल जीवन की सच्ची कविता है....
मन के - मनके...
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  May 8, 2012, 12:14 pm
मुझे, अब, बुद्ध हो जाने दो----                         बिंधे हैं कांटे,पैरों के तलुओं में                         किन-किन जन्मों के पापों के                         पापों की बन सहचरी,संग मेरे                         अधखुली पलकों से,सुप्त हुई,लेटी सी                         जाने कब,जग जाए------                ...
मन के - मनके...
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  January 5, 2012, 7:52 pm
तुम,आखरी रात,गुज़ारोगीआज,मेरे सहन में---                    जब,पहले दिन,ड्योढी पर,मेरे                    पडे थे,महावरी,तुम्हारे कदम                    तुमने,धान से भरे कलश को                    सिंदूरी अंगूठे से उढकाया था,यूं                                          जैसे कि,ब्याह कर लाया था          ...
मन के - मनके...
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  December 31, 2011, 8:22 pm
"निरंतर" की कलम से.....: ना जाने ऐसा ये क्यों हो रहा है?...
मन के - मनके...
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  December 17, 2011, 9:16 am
  कुछ यादें अमर होती है,यही नहीं,वे इतनी ताजी होती हैं कि मुंदी आंखो से,हम उन्हें ऐसे छू लेते हैं,जैसे अभी-अभी खिला फूल हो,जैसे सुबह की धूप,जाडों की सुबह में, छू कर निकल गई----ऐसी ही एक स्मृति,दशको बाद,मेरे जहन में है.मेरी हार्दिक इच्छा है,इस स्मृति को आप के साथबांट सकूं और इस म...
मन के - मनके...
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  December 16, 2011, 9:34 pm
कभी-कभी,       ये यादें,उदास क्यों हो जाती हैं?       सूने तकिये पर,सिर रख कर—       छत,क्यों निहारती हैं,       और,घर से निकल, आ जाती हैं,सूनी पगडंडी परकभी-कभी,       ये यादें, उदास क्यों हो जाती हैं/       कमरे से,बाहर आकर---       खडी हो जाती हैं,       बालकनी की रेलिंग से टिक करऔर, आसमा...
मन के - मनके...
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  December 7, 2011, 8:33 pm
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