| १.सांझ की लहरों पर--- उम्मीदों की कंदीलें हैंजीवन की सुबह ढलकतीकुछ,साथ उजाला चलता है, कंदीलों की परिछांई में—२. वैसे तो, किताबे-ए-ज़िंदगी खुली किताब है मेरी--- हर्ज़ नहीं, पलटले वर्क इसके कोई,कभी-कभी फ़कत,एक पन्ना,मोड कर रखा है,मैंने सिर्फ़ मेरे लि... |
| बहुत सीधे-सादे रूप में जीवन का सार—बस ’इस पल का मोती मेरा है—ना भूत ना भविष्य,यही पल जीवन की सच्ची कविता है.... |
| मुझे, अब, बुद्ध हो जाने दो---- बिंधे हैं कांटे,पैरों के तलुओं में किन-किन जन्मों के पापों के पापों की बन सहचरी,संग मेरे अधखुली पलकों से,सुप्त हुई,लेटी सी जाने कब,जग जाए------ ... |
| तुम,आखरी रात,गुज़ारोगीआज,मेरे सहन में--- जब,पहले दिन,ड्योढी पर,मेरे पडे थे,महावरी,तुम्हारे कदम तुमने,धान से भरे कलश को सिंदूरी अंगूठे से उढकाया था,यूं जैसे कि,ब्याह कर लाया था ... |
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December 31, 2011, 8:22 pm |
| "निरंतर" की कलम से.....: ना जाने ऐसा ये क्यों हो रहा है?... |
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December 17, 2011, 9:16 am |
| कुछ यादें अमर होती है,यही नहीं,वे इतनी ताजी होती हैं कि मुंदी आंखो से,हम उन्हें ऐसे छू लेते हैं,जैसे अभी-अभी खिला फूल हो,जैसे सुबह की धूप,जाडों की सुबह में, छू कर निकल गई----ऐसी ही एक स्मृति,दशको बाद,मेरे जहन में है.मेरी हार्दिक इच्छा है,इस स्मृति को आप के साथबांट सकूं और इस म... |
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December 16, 2011, 9:34 pm |
| कभी-कभी, ये यादें,उदास क्यों हो जाती हैं? सूने तकिये पर,सिर रख कर— छत,क्यों निहारती हैं, और,घर से निकल, आ जाती हैं,सूनी पगडंडी परकभी-कभी, ये यादें, उदास क्यों हो जाती हैं/ कमरे से,बाहर आकर--- खडी हो जाती हैं, बालकनी की रेलिंग से टिक करऔर, आसमा... |
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December 7, 2011, 8:33 pm |
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