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कवितायन : View Blog Posts
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कवितायन

करीब साढे नौ सालों के बाद अचानक फ़िर अपने ब्लॉग कि याद आई है.....उम्र ने बढते हुयेद्दर्ज कर दी थी पेशानियों पेअपनी मौजुदगीऔर सफ़ेदी बढते हुयेकह ही दिया थाकि बहुत हो चुका सबमन था किमानता ही नहीकभी यहाँ कभी वहाँअखबारों से शुरु हुआ सिलसिलाथमा तो व्हात्सएप परइस बीच पत्रिका...
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  July 1, 2017, 4:43 pm
एक बोझिल सुबह जिसमें समेटना है दिन का विस्तार इसके पहले कि मायूसियाँशाम के साथ लिपटने लगे पहलु के साथ दौड़ना है दिनभर काæ...
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Tag :दिन
  August 28, 2016, 7:22 pm
मैंजब तक नही जानता था अपने पंखों कोअन्जान था आकाश की गहराइयों से बस धरती के छोर पर ही खत्म हो जाती थी दुनिया मेरी एक सुबह आकाश ने रचे रंगों के षड़यंत्र मेरे लिएतब कहीं जाके मेरे पंखों ने लांघी क्षमता की दहलीज और समूचा आकाश सिमट आया मेरी उड़ान में ---------------------मुकेश कुमार त...
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  September 3, 2013, 11:05 pm
एक स्त्री अपने होने की जंग से कहीं ज्यादा लड़ती है, आदमी के लिए और उसके अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद में अपनी पहचान को खो देती है, दरअसल जो सहअस्तित्व का भाव है वो दांपत्य के बोझ में खो जाता है और यूँ लगता है कि जैसे स्त्री उस रिश्ते में मौजूद भर है बगैर किसी पहचान के ल...
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  May 19, 2013, 5:00 pm
मेरे एक करीबी मित्र हैं वली खान और उनके साहबजादे अमन खान, बस एक दिन यूँ ही कह बैठे कि अंकल एक ऐसी कविता सुनाओ जिसमें मैं हूँ, बच्चे की अचानक की गई इस माँग से मैं पहले तो हतप्रभ था लेकिन फिर एक प्रयास से उनके ड़ाईंग रूम में ही तकरीबन आशु कविता सी जो उस बच्चे ने बहुत पसंद की और ...
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  April 7, 2013, 5:48 pm
एक लम्बे अंतराल के बाद कोई पोस्ट कर पा रहा हूँ,  इसबीच अपनी नौकरी की व्यस्तताएँ, कमिटमेंट्स फिर बेटे का बीमार हो जाना और फिर एम.ई.(प्रोडक्शन इंजि एवं डिजाइन) कि परिक्षाएँ न जाने उलझने हैं कि खत्म ही नही होती। अब बाहा-२०१३ (www.bajasaeindia.org) की तैयारियों में उलझा हुआ हूँ, बहरहाल हा...
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  February 8, 2013, 10:37 pm
हमदोनोंकेबीचपूरेचैबीसघंटेथेयदि मेरे बस में होता तो लिख देता अपने हिस्से को भी तुम्हारे नामऔरयहजद्दोजेहद  यहीं खत्म हो जाती हमेशा के लिए किमेरे पास तुम्हारे लिए वक्त नही हैमेरेअपनेपासतोअपनी वज़हों के लिए खामोशियाँ ही बचती हैजिन्हें तुम अक्सर मेरी लाचारियों का ना...
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  October 20, 2012, 5:32 pm
हमारेबीचउम्मीदोंकाआस्माँहैऔरहमेंजोड़ताहुआइन्द्रधनुषजिससेतुमचुनतीहोकोईचटकरंगअपनीपसंदकाऔरमेरेलिएधूसरजिन्दगीमेंअबभीशेषहैंरंगकईहमारेबीचनउम्मिदियोंकीजमींहैऔरअंनततकफैलाहुआफासलामैंबोदेनाचाहताहूँतुम्हारीप्रतीक्षाकेबीज  इसछोरपेऔरतुम्हेंदेनेकेलि...
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  September 19, 2012, 5:44 pm
मैं,केवल विस्तार भर हूँ उस अशेष-शेष का और कुछ भी नही इससे ज्यादा यहाँ तक कि मेरा होना भी तुम्हारे होने की वज़ह का मोहताज है शायद,यही हमें जोड़ता भी है और अलहदा भी करता है ठीक वहीं से जहाँ तुम पाते हो अपने विचारों को गड्ड-मड्ड होते और छोड़ देते हो प्रश्नों को उलझे हुए धागों सा ...
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  August 11, 2012, 10:15 pm
सच!,मुझे तभी तक अच्छा लगा जब तक मैं समझता रहा कि केवल मुझे ही हक़ है मुँह उठा के बोल देना का कुछ भी / किसी को भीबगैर यह देखे कि मेरा सच उसके दिल को चीर के निकलेगा कहींया तोड़ देगा उसके विश्वास को कि सच होता है, अब भी ? धीरे-धीरे मुझे, यह समझ आने लगा कि सच!अक्सर तकलीफ पहुँचाता हैअब, ...
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  July 17, 2012, 8:34 am
अबमुझे कोई रूचि नही होती किबेमतलब ही झाँकता रहूँआसमान मेंऔर अपने आसपासमंडराते बादलों से करूं बातेंज़मीन की ज़मीन पर रहने वालों कीमुझेइस ऊँचाई सेअब ज़मीन पर देखनाफिर खोजते रहना बस्तियों कोया दूर तक पीछा करना सर्पिली सड़कों कानही लुभाता हैअबनही सुहाता हैचिकने पन्नों प...
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  June 11, 2012, 8:59 am
आज सुबह ही लौटा हूँ पिछले तीन दिनों से भटक रहा था कोयम्बटूर फिर बेंगलुरू। इस सफर में सिर्फ कोयम्बटूर में ही दिखे मंदिर में सिर झुकाते लोग, सड़क पर देवी की शोभा यात्रा निकालते हुए लोग यह सब देखते हुए न जाने किन ख्यालों में खो गया........... मैंआजतक नहीसमझपायाहूँकिलोगकैसेबचाले...
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  May 11, 2012, 6:03 pm
होली हो जाने के बावजूद भी न जाने क्यों आजतक वो रंगों की महक घुली हुई है मेरे इर्दगिर्द और मैं हर पल बस भीगता जाता हूँ और इन्हीं भीगे हुए पलों को जब आपसे बाँटना चाहा तो :-रंगथे यहाँवहाँफैलेहुएजैसे किसीबच्चेनेकैनवासके साथहोलीखेलीहोहर एक रंगखोरहाथाअपनी पहचानदूसरे रंग...
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  April 20, 2012, 10:15 pm
तुम्हारेपसीनेकी बू मुझेअच्छी लगती है किसीरूम फ्रेशनर से भी बेहतर औरचाहता हूँ कितुमयूँ ही मेरेतेज होती साँसों में समा जाओ इसबात का कोईमतलब नही होता किहमारे बीच लाख नासमझियाँ हों लेकिनफिर भी मैं गुमहो जाना चाहता हूँतुम्हारीबाहों के दायरे में अपनेपूरे अस्तित्व के स...
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  March 21, 2012, 5:35 pm
जबसे, दिखनेऔर बिकने के संबंधों को  गणितने परिभाषित किया औरअर्थशास्त्र के  सिद्धाँतोंने समझाया कि बिकनेके लिए दिखना सम्पूरक है कपड़ेछोटे होने लगे पहले,पतलूनऊँची हुई तोज़ुराबेंझाँकने लगी पाँयचों से बाहर फिरज़ुराबों पे लिखाजाने लगा ब्राण्ड अबसिर्फ ज़ुराबें ही पहनी जा...
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  February 21, 2012, 5:54 pm
प्रेम,अपनेकोव्यक्तकरनेकेलिएकेवलसौन्दर्यकोहीनहीखोजतावहकिसीभीरूपमेंतलाशलेताहैस्वयंकोअभिव्यक्तकरनेकारास्ताप्रेमकीविशुद्धअभिव्यक्तीमैंनेमहसूसकीहैनिश्छलझरनोंमेंअन्जानपहाड़ीकेकिसी निर्झर कोनेसे जब, कोई नदी प्रकृति के मोह मेंछलाँग लगा देती हैकिसी अनछु...
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  January 25, 2012, 5:57 pm
नये साल की पूर्व रात्रि, जो भी मन में था उसे निम्न पंक्तियों के माध्यम से आप सभी तक पहुँचा रहा हूँ।तुम्हारे,शब्द मुझे व्यापार से लगते हैं अक्सर चढ़े हुए या गिरे-गिरे से और हरबार तुम आदमी का मोल-भाव करते नज़र आते हो तुम्हारे,शब्द गंधाते हैं मेरी साँसों में ताजे माँस की तरह ...
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  January 5, 2012, 6:28 am
रिश्तोंको,जिन्दगीकीइसहद्दकेबादमैंसमझनेलगाहूँकियहाँअपना-परायाकुछनहीहोताहैयहकेवलएकभ्रमहैऔरजिसमेंनकेवलमैं, नतुमहमसभीघिरेहैंकमोबेशकेवलसन्दर्भबदलतेहैंवक्तकेसाथऔरहमतुमवहींहोतेहैंघिरेहुएऔरकुछनहीबदलताहैयहाँअलबत्ताकुछदेरमैंतुम्हारीभूमिकानिभालेता...
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  December 14, 2011, 11:09 am
तुम, यदि बचनाचाहतेहोऔरबचे रहनाभी सदियों तकतोसीखलोआदमीकोकाटनाड़र पैदाकरोंउसकीआँखोंमेंअपने लिएकोई ऐसे हीनहीजीपाताउसके साथकभी देखाहै? भीमबेटका* कीदीवारोंपरभित्तियों मेंदर्जजानवर, अबदेखनेकोनहीमिलतेमार दिये.......सबआदमी नेअपनेसाथरखतेहुए(* भीमबेटका भोपाल (म.प्र.) क...
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  November 23, 2011, 7:08 pm
खिड़कियों से,बाहर झाँकते हुए तुम कभी भी नही देख पाओगे दुनिया कैसी हैतुम्हारी किताबों से कितनी अलग जिस जमीन पर वह घर है खिड़कियों वाला वो भी उसी दुनियाँ में हैं जिसे तुम अपने ड्राईंगरूम में कार्नर टॅबल पर पाते हो  खिड़कियाँ,यदि न बनाई गई होती तो तुम शायद नही पहचान पाते हवा ...
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  October 18, 2011, 5:43 pm
आज चार दिन के प्रवास पर निकला हूँ और यह पहला ही दिन है और वो भी अभी पूरा नही हुआ है, कल सुबह से ही ट्रेनिंग क्लास और फिर न जाने क्या-क्या। लेकिन एक बात तो है, मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ...........इस वक्त भीतुम्हें,बड़ा अजीब सा लगता हैघर में यूँ ही सिमटे रहनाया समयकाटनेकोलेकर बैठ जा...
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  September 26, 2011, 8:24 pm
शायद,तुमनहीजगातेतोहमजागतेहीनहीनींदकाखुमारअबभीबाकीहैहमजैसेस्वपनमेंजीनेकेआदीहोगयेहैंऔरहमारीदुनियाजिसमेंवोभीहैंजोदेतेहैंनशाहमेंग़ाफिलकरनेकेलिएतुमनहीबतातेकिजबआसमानमेंतारेनहीहोतेतोउसेदिनकहतेहैंशायदहमजानहीनहीपातेकिदिनहोनेकामतलबक्याहैबसरातमें...
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  August 27, 2011, 7:23 pm
जो, आवाजें तुम्हें सुनाय़ी दे रही उन्हें सुनते रहना या बर्दाश्त कर पाना तुम्हारे बस में नही है तुम,बहुतकुछ न चाह के भी देख रहे हो बरबस जैसे इन्द्रियों ने खुद हथिया लिये हो सारे नियंत्रण अपनेकानों को हाथ से ढांप लेने /उंगलियाँ डाल लेने से कुछ नही होगायह आवाजें तब भी आयेंग...
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  August 13, 2011, 11:34 pm
गुरू पूर्णिमा के अवसर गुरू और गुरू दक्षिणा दोनों की ही याद आ जाती है.... गुरू द्रोणाचार्य सा और शिष्य एकलव्य जैसा। इसी परंपरा का निर्वाह आज के संदर्भ में किस प्रकार से हुआ है / किया जा रहा है, अंगूठे की उसी महत्ता को प्रस्तुत कविता में एक नई दृष्टी से देखने का प्रयास किया ह...
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Tag :
  July 16, 2011, 2:24 pm
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