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Blog: Bhoomeet | Hindi Rural Magazine | Agriculture Magazine |Farmers Magazine|Indian Magazine

Blogger: Krishan Vrihaspati
पिछले दिनों आनुवंशिक रूप से परिवर्तित यानी जीएम फसलों के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित तकनीकी समिति की रपट आने के बाद देश का वैज्ञानिक समुदाय जिस तरह आंदोलित हुआ उसे देख कर हैरानी होती है। कृषि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और जैव तकनीक, वन और पर्या... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   2:54pm 29 Dec 2013 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
जीन संशोधित फसलों से जुड़े विवाद उतने ही पुराने हैं जितनी पुरानी ये फसलें हैं। एक बार फिर से जीन संशोधित फसलों के सुर्खियों में आने की वजह देश की शीर्ष अदालत की पहल है। एक जनहित याचिका जिसमें जी.एम. फसलों के खेत-परीक्षणों पर रोक लगाने की मांग की गई थी क्योंकि इससे पर्या... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   2:33pm 29 Dec 2013 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
हाल ही में कृषि अनुसंधान केन्द्र श्रीगंगानगर में कृषि अनुसंधान एवं प्रसार परामर्शदात्री समिति (जर्क)की खरीफ फसलों पर हुई बैठक में अन्य मुद्दों के साथ जो मुख्य बात उभर कर आई वह चौंकाने वाली थी। विगत दस वर्षों से हिन्दुस्तान में कपास उत्पादन का इतिहास बदलने वाली बीटी ... Read more
clicks 156 View   Vote 0 Like   6:17pm 6 Sep 2013 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
बीटी कपास को लेकर पर्यावरणविद् कई तरह की शंकाएं व्यक्त करते रहे है लेकिन अबोहर वन्य जीव अभयारण्य पर इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। पिछले एक दशक से अभयारण्य से गायब हो चुके मोर बीटी कपास की खेती शुरू होने के बाद लौटने लगे हैं।पंजाब राज्य में राजस्थान और हरि... Read more
clicks 169 View   Vote 0 Like   2:47pm 28 Aug 2013 #
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एक दशक पहले जिस बीटी कपास ने भारत में बड़ी चकाचौंध के साथ प्रवेश किया था अब उसकी चमक फीकी पडने लगी है। पिछले दिनों बीटी कपास को लेकर दो विरोधाभासी घटनाएं एक साथ देखने को मिलीं। एक ओर कृषिमंत्री शरद पवार ने लोकसभा में बीटी कपास पर गैर-सरकारी संगठनों, सिविल सोसायटी और संस... Read more
clicks 133 View   Vote 0 Like   2:40pm 28 Aug 2013 #
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अब तक यह माना जा रहा था कि जीन प्रसंस्कृत बीटी हाइब्रिड कपास की खेती से ज्यादा उपज लेने का एकमात्र तरीका है। आज कृषि-विज्ञान में ऐसे कई साधन उपलब्ध हैं, जिनके इस्तेमाल से उन इलाकों में भी कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जो सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। ना... Read more
clicks 322 View   Vote 0 Like   7:07am 25 Aug 2013 #
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नरमे के मुकाबले देशी कपास की कीमत कम मिलने की वजह से देश के किसानों का देसी कपास की खेती से मोह पूरी तरह भंग होता जा रहा है। इतना ही नहीं, घरों में सूत की कताई कर कपड़े बुनने का रुझान भी कम होने की वजह से किसानों ने देसी कपास से दूरी बना ली है। हालात ये हैं कि मंडियों में कपा... Read more
clicks 330 View   Vote 0 Like   5:18pm 10 Jul 2013 #
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क्या आपने कभी सोचा है कि अब तक पशुओं की खुराक रहे कपास के बीज से लाखों भूखे लोगों का पेट भरा जा सकता है। कपास में पर्याप्त प्रोटीन है जिससे हर साल पाँच अरब लोगों का पेट भरा जा सकता है। शीघ्र ही यह संभव हो जाएगा। अमेरिका में टेक्सॉस के भारतीय मूल के वैज्ञानिक कीर्ति एस. र... Read more
clicks 166 View   Vote 0 Like   5:37pm 9 Jul 2013 #
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शाक-सब्जियों पर आधारित इस विशेष अंक में सब्जी उत्पादन पर तो बहुत सी बातें होंगी, पर कुछ विशेष बातें उन लोगों के बारे में भी जानलें जो इन सब्जियों को खाते हैं। आम बोल-चाल की भाषा में शाक-भाजी खाने वाले को शाकाहारी कहते हैं और नैतिक, स्वास्थ्य, पर्यावरण, धार्मिक, राजनीतिक, ... Read more
clicks 183 View   Vote 0 Like   4:27am 19 Apr 2013 #
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हर उत्पाद की मार्केटिंग के दौर में अब समय आ गया है सब्जियों की मार्केटिंग का। यह ऐसा उत्पाद है जिसकी जरूरत हर वर्ग के लोगों को होती है। सस्ती हों या फिर महंगी खाने के लिए लोगों को सब्जी की जरूरत तो होती ही है। बाजार तक सब्जियों के पहुंचने से पहले उसमें बहुत से घाल-मेल होत... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   3:35pm 9 Mar 2013 #
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विश्व में फल-सब्जियों के उत्पादन में भारत का स्थान चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। इस सूची में अमेरिका का स्थान भारत के बाद आता है। यह जानकारी कुछ समय पहले कृषि तथा उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री प्रो. केवी थॉमस ने लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में दी थी। थॉमस ने भारतीय ... Read more
clicks 232 View   Vote 0 Like   3:29pm 9 Mar 2013 #
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भारत की संस्कृति कथा को चार युगों-सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग में बांटा गया है। शास्त्रानुसार चाहे इन कालखण्डों की कुछ भी व्याख्या की गई हो पर प्रगति के आधार पर कहा जा सकता है कि सतयुग केवल मानव श्रम का युग था, जबकि त्रेता में आदमी के हाथ में लकड़ी और पत्थर के हथियार ... Read more
clicks 230 View   Vote 0 Like   10:27am 17 Jan 2013 #
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नैनो कार की तरह एक लखटकिया ट्रैक्टर बाजार में आने की चर्चा समय-समय पर होती रहती है। यह खबर सुनकर खेती-बारी से जुड़े तमाम लोगों के मन में यह सवाल उठने लगता है कि क्या लाख रुपए का ट्रैक्टर किसानों को मिल सकता है? इसकी उपयोगिता और क्षमता क्या होगी? क्या इससे खेती की जरूरतें ... Read more
clicks 299 View   Vote 0 Like   10:20am 17 Jan 2013 #
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किसानों के मित्र समझे जाने वाले मित्र पक्षियों की कई प्रजातियां काफी समय से दिखाई नहीं दे रहीं हैं। किसान मित्र पक्षियों का धीरे-धीरे गायब होने के पीछे बहुत से कारणों में एक बड़ी वजह किसानों द्वारा कृषि में परंपरागत तकनीक छोड़ देने, मशीनीकरण व कीटनाशकों के व्यापक इस... Read more
clicks 322 View   Vote 0 Like   4:24pm 12 Jan 2013 #
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विश्व में खेती का इतिहास जितना पुराना है कमो-बेश कृषि यंत्रों का इतिहास भी उतना ही पुराना है। खेतों को तैयार करने, जोतने बोने, फसल काटने आदि के लिए मनुष्य को आरंभ से ही उपकरणों की जरूरत रही है। आरंभ में वे सब औजार लकड़ी, पत्थर या हड्डी के रहे होंगे लेकिन धातु के आविष्कार ... Read more
clicks 328 View   Vote 0 Like   4:14pm 12 Jan 2013 #
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भारतीय बैंकों पर अकसर इल्जाम लगता है कि ये कार लेने वालों से कम और कृषि यंत्र लेने वाले से ऊँची दरों पर ब्याज वसूते हैं। यह अरोप सही भी है क्योंकि जहां कार पर 10 प्रतिशत ब्याज लिया जाता है वहीं ट्रैक्टर 13 प्रतिशत ब्याज से कम पर नहीं मिल सकता। अगर कार लेने वाले की साख अच्छी ... Read more
clicks 186 View   Vote 0 Like   5:22pm 5 Jan 2013 #
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केंद्रीय बजट से पूर्व कृषि क्षेत्र में यंत्रीकरण पर फिक्की-यस बैंक की रिपोर्ट को हालांकि अब बहुत समय हो चुका है, पर इसकी प्रासंगिता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। इस अध्ययन में कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए, पहला यह कि प्राकृतिक संसाधनों में कमी और जलवायु परिवर्तन जैस... Read more
clicks 220 View   Vote 0 Like   10:46am 4 Jan 2013 #
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इंसान ने कब, कहाँ और कैसे खेती करना आरंभ किया, इसका उत्तर देना आसान नहीं है। सभी देशों के इतिहास में खेती के विषय में कुछ न कुछ दावे जरूर किए गए हैं। माना जा सकता है कि आदिम समय में जब मनुष्य जंगली जानवरों का शिकार पर ही निर्भर था तथा बाद में जब उसने कंद-मूल, फल और अपने-आप उग... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   10:33am 4 Jan 2013 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
कृषि वैज्ञानिक डॉ. हनुमान प्रसाद, जैव कृषि विशेषज्ञ एन. एस. राठौड़, डेअरी विशेषज्ञ प्रो. (कर्नल) ए. के. गहलोत, डा. ओ.पी.पारीक, डा. गोपाललाल, बी.एम.दीक्षित,  प्रगतिशील कृषक सुंडाराम वर्मा एवं प्रगतिशील महिला कृषक श्रीमती सुचित्रा आर्य पर आधारित राजस्थान किसान आयोग के मनोनीत ... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   5:47pm 16 Nov 2012 #
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डॉ. भरत झुनझुनवालायूपीए सरकार की महत्त्वकांक्षी योजना मनरेगा के सार्थक परिणाम सामने आ रहे हैं। श्रमिकों को रोज़गार अपने घर के पास उपलब्ध हो रहा है। परियोजना में 100 दिन के रोज़गार की व्यवस्था है जिसे अब बढ़ाकर 150 दिन किया जाना प्रस्तावित है। हालांकि 100 दिन के रोज़गार मे... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   2:45pm 6 Nov 2012 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
देश में सहकारिता के कुछ जानकारों का मानना है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से चल रहा सहकारिता आंदोलन बिखरने के कगार पर है। हालांकि यह आज विराट रूप धारण कर चुका है और एक अनुमान के अनुसार इस समय देशभर में करीब 5 लाख से अधिक सहकारी समितियां सक्रिय हैं। इसमें भी कोई दोराय ... Read more
clicks 151 View   Vote 0 Like   3:00pm 1 Nov 2012 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
कल्पना करें आज से पच्चीस हजार वर्ष पहले की, जब आदमी मुख्यतया शिकार पर ही जीवन यापन करता था जब जंगल में उससे कहीं अधिक सशक्त जानवरों का राज्य था, तब यह दुर्बल सा प्राणी बिना हथियारों के मात्र लाठी और पत्थर की सहायता से अपनी रक्षा कैसे पाया? और कैसे उन सशक्त जानवरों को अपने... Read more
clicks 165 View   Vote 0 Like   3:22pm 30 Oct 2012 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
माना जाता है कि सहकारिता देश में सदियों से चली आ रही संयुक्त परिवार प्रणाली के सिद्धातों पर आधारित है। चाहे वर्तमान में सहकारिता की नींव रहे संयुक्त परिवार न रहे हों पर सहकारिता अभी जिन्दा है। यह अलग बात है कि आज सहकारिता के अर्थ और संदर्भ दोनों बदल चुके हैं।  आजादी के... Read more
clicks 164 View   Vote 0 Like   4:24pm 29 Oct 2012 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
गुजरात और कुछ हद तक महाराष्ट्र को छोड़कर समूचे उत्तर भारत में सहकारिता आन्दोलन पर नजर डालें तो सहकारिता का अर्थ कुछ और ही दिखता है। बिहार और मध्यप्रदेश से लेकर हरियाणा, राजस्थान और पंजाब तक फैली आखिरी सांस लेती चीनी, रूई और तेल मिलें, लगातार बंद होते सहकारी बाजार और कर... Read more
clicks 189 View   Vote 0 Like   5:16pm 28 Oct 2012 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
आजादी के 65 साल बाद भी देश ऐसे डॉक्टरों से भरा पड़ा जिन्हें बोलचाल की भाषा में आरएमपी या झोलाछाप कह कर बुलाते हैं। ये लोग सिर्फ गाँवों में ही नहीं देश और राज्यों की राजधानियों तक में अपनी दुकानें सजा कर बैठे हैं, और विभिन्न पैथियों से इलाज के नाम पर लोगों के जीवन से खेल रह... Read more
clicks 206 View   Vote 0 Like   4:24pm 14 Sep 2012 #
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