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युग दृष्टि

सुनो जी ! स्वप्न लोक में आजदिखा मुझे सरोवर एक महान देख था गगन रहा निज रूप उसी में कर दर्पण का भाननील थी स्वच्छ वारि की राशिउदित था उस पार मिथुन मरालपंख उन दोनों के स्वर्णाभ कान्ति की किरणे रहे उछाल यथा पावस -जलदो से मुक्त नीला नभ -मंडल होवे शांत अचानक प्रकटित हो कर साथ दिख...
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  July 4, 2012, 8:19 am
है ये कितनी श्यामलता ?रजनी ये कैसी भोली है , है चन्द्र इसे नितनित  छलता रह रह छोड़ इसे शशि जाता तनिक ना मन में छली लजाता सहृदयता से रखे ना नाता अति कुटिल चाल ये चलता है ये कितनी श्यामलता ?जब वह निर्मम रहे भवन में छटा छिटकती इसके तन में ज्योति जागती है जीवन में रहती अतिशय है उ...
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  June 23, 2012, 4:00 pm
नव घन जल से भरकरअंकों में चपल तरंगे इस लघु सरिता के तन में उमड़ी  है अमिट  तरंगेनिज प्रिय वारिधि दर्शन को उन्माद उत्कंठा  मन में बस एक यही आकांक्षा है समां गई कण कण में निज अखिल शक्ति भर गति मेंवह त्वरित चली जाती हैकष्टों की करुण कहानी क्या कभी  याद आती है ?पथ की अति विस्त...
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  June 13, 2012, 7:35 am
ईश !  अब तो श्रांत  ये पद -प्रान्त है लग्न से विजड़ित  बने  क्लम-क्लांत है किन्तु करना पार , हे गिरी ! है तुझे क्या करूँ ? कह दीर्घकाय , बता मुझे भीम भारी रुक्ष कृष्ण कड़े कड़े उपल तेरे अंक पर  अगणित पड़े है कही प्राचीर सी तरु श्रेणियां झाड़ियाँ है गुथी हुई  ज्यों वेणियाँह्रदय तो ...
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  June 1, 2012, 3:52 pm
बरस गए मेघ, रज कण में तृण  की पुलकावली भर तुहिन कणों से उसके , अभिसिंचित हो उठे तरुवर लिख कवित्त,विरुदावली गाते लेखनी श्रेष्ठ कविवर पादप, विटपि, विरल विजन में, भीग रहे नख -सर   पा प्रेम सुधा को  अंक में ,स्वनाम धन्य हो रहे सरोवरकृतार्थ भाव मानती धरा,खग कुल -कुल  गाते  सस्वरअल...
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  May 22, 2012, 3:27 pm
 माँ को याद करने का कोई एक दिन, ये हमारी संकृति का अंग नहीं है . हम तो अपनी माँ को प्रतिदिन, प्रतिक्षण याद करते है . पाश्चात्य जगत में भावनाओ के सामयिक क्षरण , अभिकेंद्रित होते परिवार में शायद माँ शब्द वर्ष में एक बार याद करने लायक हो गया है .. माँ , वात्सल्य  , त्याग ,और स्नेह ...
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  May 13, 2012, 8:11 am
iवो खेत में मसूर काटेपैर में बिवाई फाटेहंसिया ताबड़ तोड़ चलावे हथेली में पड़ गई गांठे करईल की खांटी  मिटटी जरत है अंगार नियर कपार से कुचैला सरकत मुँह झहाँ के हो गईल पीयर जांगर की प्रतिष्ठा में , जाने केतना  लेख लिखायल सुरसती का स्वेद बोले घायल की गति जाने घायल गुदड़ी मे...
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  May 1, 2012, 6:25 pm
खिल रहे है  बगिया में   ,शुभ्र   धवल गुलाब विटप गीत  गुनगुना रहे , मुदित मन रहा नाच छन -छन  आती सोंधी सुगंध  , है घनदल छाये हुए .कलियों की स्मित मुस्कानचन्द्रकिरण में नहाये हुए मधुकर का मधुर  मिलन गीत पिक की विरह तानमंदिर की दिव्य वाणी   ,मस्जिद से आती है अजानकलियों की चंचल  च...
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  April 20, 2012, 2:02 pm
आजकल दिल्ली प्रवास चल रहा है , कल शाम को अचानक काले  बादल आए  और पुरे शहर पर छा गए  . शाम को ५ बजे ही घनघोर अँधेरा . जैसे रात्रि के ८ बजे हो . कुछ पंक्तिया जेहन में आई तो मुलाहिजा फरमाएं .नभ के प्रदेश में जलधर फैलाते अपना आसन अधिकार जमा क्रम -क्रम से दृढ करते अपना शासन आच्छादित...
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  April 11, 2012, 5:30 pm
कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगायाक्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलायादुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छायालाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आयाविस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्...
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Tag :astitv
  March 14, 2012, 7:07 pm
संध्या ने नभ के सर में अपनी अरुणाई घोली दिनकर पर अभिनव रोली बिखरे भर भर झोली रंगीन करों में उसके देख  रंगभरी पिचकारी पश्चिम के पट में छिपने भागे  सहस्र करधारीधूमिल प्रकाश  में लख यह नभ-रंगभूमि की लीला नत -नयना नलिनी का मुखमुरझाया हो कर पीलातब आ कर अलि -बालाएं निज मृद...
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Tag :savera
  March 2, 2012, 4:40 pm
किताबे पढने का शौक जो बचपन से लगा अभी तक निर्विघ्न और अनवरत जारी है. सामने पुस्तक देखकर मेरी आँखों में उसे पढने की ललक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.. अपने बचपन के दिनों में मुझे हिंदी के कुछ मूर्धन्य  और देदीप्यमान साहित्यकारों को  सन्मुख देखने को  मिला.  मुझे कई साल बाद ...
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  January 13, 2012, 3:47 pm
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