POPULAR ENGLISH+ SIGNUP LOGIN

Blog: युग दृष्टि

Blogger: ashish rai
सुनो जी ! स्वप्न लोक में आजदिखा मुझे सरोवर एक महान देख था गगन रहा निज रूप उसी में कर दर्पण का भाननील थी स्वच्छ वारि की राशिउदित था उस पार मिथुन मरालपंख उन दोनों के स्वर्णाभ कान्ति की किरणे रहे उछाल यथा पावस -जलदो से मुक्त नीला नभ -मंडल होवे शांत अचानक प्रकटित हो कर साथ दिख... Read more
clicks 157 View   Vote 0 Like   2:49am 4 Jul 2012 #
Blogger: ashish rai
है ये कितनी श्यामलता ?रजनी ये कैसी भोली है , है चन्द्र इसे नितनित  छलता रह रह छोड़ इसे शशि जाता तनिक ना मन में छली लजाता सहृदयता से रखे ना नाता अति कुटिल चाल ये चलता है ये कितनी श्यामलता ?जब वह निर्मम रहे भवन में छटा छिटकती इसके तन में ज्योति जागती है जीवन में रहती अतिशय है उ... Read more
clicks 158 View   Vote 0 Like   10:30am 23 Jun 2012 #
Blogger: ashish rai
नव घन जल से भरकरअंकों में चपल तरंगे इस लघु सरिता के तन में उमड़ी  है अमिट  तरंगेनिज प्रिय वारिधि दर्शन को उन्माद उत्कंठा  मन में बस एक यही आकांक्षा है समां गई कण कण में निज अखिल शक्ति भर गति मेंवह त्वरित चली जाती हैकष्टों की करुण कहानी क्या कभी  याद आती है ?पथ की अति विस्त... Read more
clicks 124 View   Vote 0 Like   2:05am 13 Jun 2012 #
Blogger: ashish rai
ईश !  अब तो श्रांत  ये पद -प्रान्त है लग्न से विजड़ित  बने  क्लम-क्लांत है किन्तु करना पार , हे गिरी ! है तुझे क्या करूँ ? कह दीर्घकाय , बता मुझे भीम भारी रुक्ष कृष्ण कड़े कड़े उपल तेरे अंक पर  अगणित पड़े है कही प्राचीर सी तरु श्रेणियां झाड़ियाँ है गुथी हुई  ज्यों वेणियाँह्रदय तो ... Read more
clicks 141 View   Vote 0 Like   10:22am 1 Jun 2012 #
Blogger: ashish rai
बरस गए मेघ, रज कण में तृण  की पुलकावली भर तुहिन कणों से उसके , अभिसिंचित हो उठे तरुवर लिख कवित्त,विरुदावली गाते लेखनी श्रेष्ठ कविवर पादप, विटपि, विरल विजन में, भीग रहे नख -सर   पा प्रेम सुधा को  अंक में ,स्वनाम धन्य हो रहे सरोवरकृतार्थ भाव मानती धरा,खग कुल -कुल  गाते  सस्वरअल... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   9:57am 22 May 2012 #
Blogger: ashish rai
 माँ को याद करने का कोई एक दिन, ये हमारी संकृति का अंग नहीं है . हम तो अपनी माँ को प्रतिदिन, प्रतिक्षण याद करते है . पाश्चात्य जगत में भावनाओ के सामयिक क्षरण , अभिकेंद्रित होते परिवार में शायद माँ शब्द वर्ष में एक बार याद करने लायक हो गया है .. माँ , वात्सल्य  , त्याग ,और स्नेह ... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   2:41am 13 May 2012 #
Blogger: ashish rai
iवो खेत में मसूर काटेपैर में बिवाई फाटेहंसिया ताबड़ तोड़ चलावे हथेली में पड़ गई गांठे करईल की खांटी  मिटटी जरत है अंगार नियर कपार से कुचैला सरकत मुँह झहाँ के हो गईल पीयर जांगर की प्रतिष्ठा में , जाने केतना  लेख लिखायल सुरसती का स्वेद बोले घायल की गति जाने घायल गुदड़ी मे... Read more
clicks 144 View   Vote 0 Like   12:55pm 1 May 2012 #
Blogger: ashish rai
खिल रहे है  बगिया में   ,शुभ्र   धवल गुलाब विटप गीत  गुनगुना रहे , मुदित मन रहा नाच छन -छन  आती सोंधी सुगंध  , है घनदल छाये हुए .कलियों की स्मित मुस्कानचन्द्रकिरण में नहाये हुए मधुकर का मधुर  मिलन गीत पिक की विरह तानमंदिर की दिव्य वाणी   ,मस्जिद से आती है अजानकलियों की चंचल  च... Read more
clicks 164 View   Vote 0 Like   8:32am 20 Apr 2012 #
Blogger: ashish rai
आजकल दिल्ली प्रवास चल रहा है , कल शाम को अचानक काले  बादल आए  और पुरे शहर पर छा गए  . शाम को ५ बजे ही घनघोर अँधेरा . जैसे रात्रि के ८ बजे हो . कुछ पंक्तिया जेहन में आई तो मुलाहिजा फरमाएं .नभ के प्रदेश में जलधर फैलाते अपना आसन अधिकार जमा क्रम -क्रम से दृढ करते अपना शासन आच्छादित... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   12:00pm 11 Apr 2012 #
Blogger: ashish rai
कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगायाक्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलायादुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छायालाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आयाविस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्... Read more
clicks 154 View   Vote 0 Like   1:37pm 14 Mar 2012 #astitv
Blogger: ashish rai
संध्या ने नभ के सर में अपनी अरुणाई घोली दिनकर पर अभिनव रोली बिखरे भर भर झोली रंगीन करों में उसके देख  रंगभरी पिचकारी पश्चिम के पट में छिपने भागे  सहस्र करधारीधूमिल प्रकाश  में लख यह नभ-रंगभूमि की लीला नत -नयना नलिनी का मुखमुरझाया हो कर पीलातब आ कर अलि -बालाएं निज मृद... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   11:10am 2 Mar 2012 #savera
Blogger: ashish rai
किताबे पढने का शौक जो बचपन से लगा अभी तक निर्विघ्न और अनवरत जारी है. सामने पुस्तक देखकर मेरी आँखों में उसे पढने की ललक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.. अपने बचपन के दिनों में मुझे हिंदी के कुछ मूर्धन्य  और देदीप्यमान साहित्यकारों को  सन्मुख देखने को  मिला.  मुझे कई साल बाद ... Read more
clicks 144 View   Vote 0 Like   10:17am 13 Jan 2012 #
[ Prev Page ] [ Next Page ]

Share:

Members Login

    Forget Password? Click here!
  • Latest
  • Week
  • Month
  • Year
  हमारीवाणी.कॉम पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि बहुत सरल हैं। इसके लिए सबसे पहले प्रष्ट के सबसे ऊपर दाईं ओर लिखे ...
  हमारीवाणी पर ब्लॉग-पोस्ट के प्रकाशन के लिए 'क्लिक कोड' ब्लॉग पर लगाना आवश्यक है। इसके लिए पहले लोगिन करें, लोगिन के उपरांत खुलने वाले प...
और सन्देश...
कुल ब्लॉग्स (4019) कुल पोस्ट (193765)