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Blog: स्वर-यात्रा

Blogger: Pratibha Saksenas
उन्नयन (UNNAYANA): माँ तुझे प्रणाम !माँ के बिना कोई काम नहीं चलता जब भी ज़रूरत हो वही याद आती है!... Read more
clicks 373 View   Vote 0 Like   2:29am 12 May 2013 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*बीतते बरस लो नमन !*जुड़ गया एक अध्याय और ,गिनती आगे बढ़ गई ज़रा ,जो शेष रहा था कच्चापन ,परिपक्व कर गए तपा-तपा .आभार तुम्हारा बरस ,कितोड़े मन के सारे भरम !*फिर से दोहरा लें नए पाठ,दो कदम बिदा के चलें साथ .बढ़ महाकाल के क्रम में लो स्थान ,रहे मंगलमय यह प्रस्थान !चक्र घूमेगा कर निष... Read more
clicks 341 View   Vote 0 Like   8:51pm 27 Dec 2010 #बीतते बरस
Blogger: Pratibha Saksenas
*( माँ भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है- समय का फेर !)रीत रहा शब्द कोश ,छीजता भंडार ,बाधित स्वर ,विकल बोलजीर्ण वस्त्र तार-तार .भास्वरता धुंध घिरी दुर्बल पुकार नमित नयन आर्द्र विकल याचिता हो द्वार-'देहि भिक्षां ,पुत्र ,भिक्षां देहि !'*डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश ,... Read more
clicks 319 View   Vote 0 Like   6:00am 11 Nov 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
एक सीमा है हर रिश्ते की , एक मर्यादा ,एक पहुँच!बस वहीं तक निश्चित- निश्चिन्त. शोभनीय -सुरुचिमय . प्रसन्न और सुन्दर ! * इसके आगे कोरा छलावा . विकृत, सामंजस्यहीन , दुराव-छिपाव का ग्रहण , शंकाओं का जागरण.क्योंकि अस्लियत मन जानता है ,कोई जान सकता भी नहीं. अवशिष्ट अपराध-बोध , अंतरात्... Read more
clicks 288 View   Vote 0 Like   4:07am 19 Oct 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*शैशव की लीलाओँ में वात्सल्य भरे नयनों की छाँह तले ,सबसे घिरे तुम ,दूर खड़ी देखती रहूँगी .यौवन की उद्दाम तरंगों में ,लोकलाज परे हटा ,आकंठ डूबते रस-फुहारों में जन-जन को डुबोते ,दर्शक रहूँगी ,कठिन कर्तव्य की कर्म-गीता का संदेश कानों से सुनती-गुनती रहूँगी .*लेकिन ,जब अँधे-युग क... Read more
clicks 308 View   Vote 0 Like   1:07am 2 Oct 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
कथा एक -*इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते. अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको ... Read more
clicks 296 View   Vote 0 Like   6:58pm 6 Sep 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते. अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको बड़ा शौ... Read more
clicks 276 View   Vote 0 Like   5:41am 6 Sep 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*(स्वतंत्रता के बाद पहले महाकुंभ के अवसर पर ऐसी अव्यवस्था हो गई  कि भीड़ में अँधाधुंध भागदड़ मच गई और बहुत लोग गिर-गिर कर रौंदे जाते रहे -अधिकारी वर्ग पं. नेहरू के स्वागत में व्यस्त था.तब लिखी गई थी यह  - कुंभ-कथा)*मानव के यह आँसू शायद सूख चलें पर ,मानवता के अश्रु-लिखित यह करु... Read more
clicks 298 View   Vote 0 Like   12:53am 19 Aug 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*आज सूरजरोज से कुछ देर से निकला !लो ,तुम्हारी हो गई सच बात ,सूरज देर से निकला !*कुछ लगा ऐसा कि लम्बी हो गई है रात ! और रुक सी गई ,तारों की चढी बारात .धीमी पड गई चलती हुई हर साँससूरज देर से निकला !*घडी धीरे चल रही ,कुछ सोचता सा कालधर रहा है धरा पर हर पग सम्हाल-सम्हाल !बँधा किसकी बाँह ... Read more
clicks 333 View   Vote 0 Like   7:05pm 7 Aug 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
**जब न मैं होऊ ,बताओ क्या करोगे १ नए ढँग से ज़िन्दगी का हर पहाड़ा , बहुत श्रम से सीखना होगा दुबारा इसलिए कुछ धैर्य धर शुरुआत कर लो ,भंग होगा क्रम जहाँ मेरा -तुम्हारा !कौन समझेगा ,अकेले ही सहोगे !*मुझे अब कोई भनक लगने लगी है ,कान में कुछ वंशियाँ बजने लगी हैं ,दूर के कुछ स्वर सुनाई... Read more
clicks 340 View   Vote 0 Like   4:49am 25 Jul 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*कौन गति !एक नन्हीं-सी ज्योति !माटी में आँचल में अँकुआता बीज !काल -धारा में बहे जा रहे जीवन को निरंतरता की रज्जु में बाँधता,भंगुर-से तन में सँजोए नवनिर्माण कण काल से आँख मिलाती नव-जीवन रचतीधरती या नारी ?*उस अंतर्निहित ज्योति का स्फोट दर्पण पर प्रतिवर्तित असह्य प्रकाश ! स... Read more
clicks 290 View   Vote 0 Like   4:37am 2 Jul 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
चिट्ठी के एक ही पृष्ठ से मैं पूरी गाथा पढ़ जाऊं ! नेह तुम्हारा पा ,जाने क्यों उमड़-उमड़ आता मेरा मन ,बड़े बंधु के आगे जगता ,छोटी सी बहिना का बचपन !इस कमरे में जहाँ बैठ कर पढ़े जा रही तेरे आखर ,हर कोने में लगता जैसे नया उजास छा गया आकरजाने क्यों आँखें भऱ आईं कोई पूछे क्या समझ... Read more
clicks 296 View   Vote 0 Like   3:02am 15 Jun 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*बहुत दिन हो गए नदिया बड़ी संयत रही है .लहर के जाल में सब-कुछ समाए जा रही है .कहीं कुछ शेष बचता ,जमा बैठा जो तलों में .बहुत दिन से न जागा वेग मंथर वह रही बस प्रवाहित मौन सी चुपचाप धारा ,समेटे जाल सारे, डुबोए जल में समाए .कहीं बरसा न पानी ,हिम-शिखर पिघला न कोई उमड़ने दो बहुत दिन हो... Read more
clicks 332 View   Vote 0 Like   2:24am 10 Jun 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*हे,मातृ रूप हे विश्व-प्राण की प्रवाहिका हे नियामिका वह परम-भाव ही इस भूतल पर छाया बन करुणा-ममता केवल अनुभव-गम्या, रम्या धारणा-जगतके आरपार तुम मूल सृष्टि नित पुष्टि हेतु सरसा जीवन की अमियधार *इस अखिल सृष्टि के नारि-भाव उस महाभाव के अंश रूपउस परम रूप की छलक व्यक्त नारी-मन ... Read more
clicks 292 View   Vote 0 Like   11:01pm 8 May 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
केवल तुम्हारी थी थोड़ा-सा आत्म-तोष चाहता रहा था मनपीहर में पति- सुख पा इठलाती बाला बन मन में उछाह भर ताज़ा हो जाने का ,बार-बार आने का अवसर, सुहाग-सुख पाने का .*थोड़ा सा संयम ही चाहा था रत्ना ने ,भिंच न जाय मनःकाय थोड़ा अवकाश रहे,खुला-धुला ,घुटन रहित ,नूतन बन जाएपास आने की चाह .*... Read more
clicks 327 View   Vote 0 Like   5:17am 5 May 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
* ' यह संस्कृति का वट-वृक्ष पुरातन-चिरनूतन कह 'चरैवेति' जो सतत खोजता नए सत्य जड़ का विस्तार सुदूर माटियों को जोड़े निर्मल ,एकात्म चेतना का जीवन्त उत्स,*आधार बहुत दृढ़ है कि इसी की शाखाएँ मिट्टी में रुप कर स्वयं मूल बनती जातीं,जिसकी छाया में आर्त मनुजता शीतल हो चिन्ताधारा ... Read more
clicks 328 View   Vote 0 Like   5:52am 30 Apr 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
*हर घर में कुछ कुठरियाँ या कोने होते हैं जहाँ फ़ालतू कबाड़ इकट्ठा रहता है ।मेरे मस्तिष्क के कुछ कोनो में भीऐसा ही अँगड़-खंगड़ भरा है ।जब भी कुछ खोजने चलती हूँ तमाम फ़ालतू चीज़ें सामने आ जाती हैं ,उन्हीं को बार-बार ,देखने परखने में लीन भूल जाती हूँकि क्या ढूँढने आई थी!*... Read more
clicks 307 View   Vote 0 Like   5:23am 18 Apr 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
वन घासों के बीच झिलमिलाते इतने दीप !*इस निर्जन वन-खंडिका में संध्याकाश के नीचे कौन धर गया ?*क्रीक के दोनों ओर ,ढालों पर, निचाइयों में और हरी-भरी ऊँचाइयों पर भी . सघन श्यामलता में दीप्त होते चंचल हवा से अठखेलियाँ करते कितने -कितने दीप !*सुनहरी लौ के प्रतिबिंब तल की जल-धारा मे... Read more
clicks 287 View   Vote 0 Like   5:14am 14 Apr 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
स्वर मुझे दो ,मैं तुम्हारी प्रार्थना हूँ .*भाव में डूबे अगम्य अगाध होकर ,व्याप जाने दो हवाओं की छुअन में ,लहर में लिखती रहूँ जल वर्णमाला ,कौंध भऱ विद्युतलता के अनुरणन में कुहू घन अँधियार व्याप्त निशीथिनी में किसी संकल्पित सुकृत की पारणा हूँ *शंख की अनुगूँज का अटका हुआ स... Read more
clicks 333 View   Vote 0 Like   9:28pm 27 Mar 2010 #
Blogger: Pratibha Saksenas
एक पुरानी कविता -सपनों जैसे नयनों में झलक दिखा जाते कैसे होंगे सरिता तट, वे झाऊ के वन !*घासों के नन्हें फूल उगे होंगे तट पर ,रेतियाँ कसमसा पग तल सहलाती होंगी वन-घासों को थिरकन से भरती मंद हवा ,नन्हीं-नन्हीं पाँखुरियाँ बिखराती होगी जल का उद्दाम प्रवाह अभी वैसा ही है ,या समा... Read more
clicks 314 View   Vote 0 Like   5:03am 18 Mar 2010 #
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